Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
03-20-2019, 12:10 PM,
#1
Exclamation  Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
नई कहानी हिंदी में शुरू कर रहा हु मुझे हिंदी में ज्यादा लिखना नही आता अगर कुछ गलती हो तो माफ् करना यह कहानी मा और बेटे के बीच संबंध पर आधारित है धन्यवाद

IGI एयरपोर्ट दिल्ली के अराइवल गेट पर खड़ी अंजलि बैचनी से अपनी साड़ी के पल्लू से उँगलियाँ उलझाये अंदर से आ रहे यात्रियों को देख रेहि थी। वो वहां पिछले तीन घंटो से खड़ी थी। उसके पति के बार बार कहने के बावजूद के फ्लाइट उतरने मैं अभी दो घंटो से भी ज्यादा का समय है वो वहां से नहीं हटी थी। वो अपने पति को जिद्द करके समय से बहुत पहले वहां ले आई थी। और अब जब्ब फ्लाइट उतरे लगभग आधा घंटा हो चुका था तोह उससे एक पल्ल भी सबर नहीं हो रहा था। वो भीड़ मैं से ऐड़ियों के बल ऊँची होकर आने वाले हर यात्री को देखति मगर वो उस दिख नहीं रहा था। उसके पति ने उसकी बेचैनी जान कर उसे थोड़ी हिम्मत बंधाने की कोशिश और उसे समझाया के कभी कभी भीड़ होने के कारन चेक आउट मैं ज्यादा समय लग्ग जाता है। मगर पति के हर अस्वाशन के बावजूद आंजली की बैचेनि, उसकी अधीरता बढ़ती जा रही थी। उसकी आँखे, उसकी गर्दन, उसके कन्धो मैं दरद होने लगा था। वो एयरपोर्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को कोस रही थी। चार साल से ज्यादा समय बीत चुका था। उसने इतना लम्बा समय सीने पर पथ्थर रखकर झेला था मगर अब उससे एक पल्ल भी झेला नहीं जा रहा था। अखिरकार जब्ब उसकी इंतज़ार की पीडा बेचैनी आंसूयों का रूप लेने वाली थी उसे सामने से वो आता दिखयी दिया। उस पर नज़र पढते ही अंजलि का दिल कुछ पलों के लिए धड़कना भूल गेया। उसने उसे पहली नज़र मैं ही पहचान लिया था। हालाँकि उसके चेहरे में, डील डौल मैं काफी फरक आ चुका था मगर वो फरक अंजलि की नज़र के सामने कुछ भी नहीं था। व ट्राली पर तीन बैग रखे तेज़ी से बहार को आ रहा था। वो तेज़ तेज़ चलता भीड़ मैं से किसी का चेहरा ढूंढ रहा था। सभी लोग जिनके अपने बाहर आ रहे थे, उन्हें देख कर हाथ हिला रहे थे उनको पुकार रहे थे मगर अंजलि उसे पुकार न सकी, उसके रुंधे गले से आवाज़ न निकल सकीऔर न ही वो अपना हाथ उठा कर हिला सकी। वो बस बूथ की तेरह उसे देख रही थी। तभी उसकी नज़र अंजलि पर पढी। भीड़ में से चेहरा तलाशते जब्ब उसकी नज़र आखिरकार अंजलि के चेहरे से टकराई तोह एक पल को उसने अपनी ऑंखे सिकोड़ी जैसे पह्चानने की कोशिश कर रहा हो। मगर अगले ही पल उसका पूरा चेहर ख़ुशी से खील उथ। 

"माअअअअअअअ" वो मुस्कराते हुए ज़ोर से चिल्लाया। 

आंजलि का पूर वजूद कांप उठा वो इतने समय से खुद को रोके हुए थी। मगर वो लफ़ज़ सुनते ही अंजली की आँखों से आंसूयों की धाराएँ बह नीकली आगर उसके पति ने उसे थमा न होता तोह सायद वो गिर ही जाती। 

एयरोप्लेन में नाश्ता देणे के बाद जलद ही लाइट्स बंद कर दी गयी थी जिन्ह सोना था वो सो सकते थे। मगर विशाल की आँखों में नींद नहीं थी। चौदह घंटे की लम्बी फ्लाइट थी और इतने लम्बे अरसे बाद उसके लिए यह चौदह घंटे काटने बेहद्द मुश्किल थे पिछले चार सालों से भी ज्यादा समय से वो परदेश में रह रहा था। आज भी उसे वो दिन याद था जिस दिन उसने अमेरिका के लिए घर से निकलना था। उसकी माँ कितनी खुश थी मगर जितनी वो खुश थी उससे कहीं बढ़कर वो उदास थी। उसके चेहरे पर इतनी उदासी देख खुद विशाल का गाला भर आया था। वो बड़े भरी दिल से घर से निकला था। विशाल अपनी यादों में खो जाता है।
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03-20-2019, 12:10 PM,
#2
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
विशाल सुरु से ही बहुत तेज़ तर्रार दिमाग वाला लड़का था। उसने हमेशा क्लास में टॉप किया था। पढ़ने में उसकी इतनी दिलचप्सी थी के वो कभी कभी पूरी पूरी रात जाग कर पढता था। उसके माँ बाप को उसके टीचर्स को उस पर फक्र था। उसने जब्ब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की डिग्री में पूरे स्टेट में टॉप किया तोह ऊसके सामने जॉब ऑफर्स की झड़ी लग गायी। मगर इससे पहले के वो कोई ऑफर स्वीकार कर पाता, उसे एक और ऑफर मिला। वो था अमेरिका की एक टॉप यूनिवर्सिटी द्वारा आगे पढ़ने के लिए फुल स्कालरशिप का ऑफर। मतलब पढ़ाई और रेहना खाने पिने का सबका खर्चा स्कालरशिप में कवर्ड था। वो ऐसा ऑफर था जिसको पाने के लिए हज़ारों लाखों स्टूडेंट्स ख़्वाब देखते हैं। मगर विशाल खुश नहीं था। अपने माँ बाप की एकलौती औलाद होने के कारन उन्होनो विशाल को इतने प्यार से पाला था खास करके उसकी माँ ने के वो उनसे दूर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। अपनी माँ को अकेला छोडने का ख्याल भी उसे गंवारा नहीं था।
मगर आंतता उसे मानना पढा। खुद उसके माँ बाप की जिद्द थी। उसका बाप जो खुद एक जूनियर इंजीनियर था, विशाल को इंडिया के किसी अच्छे कॉलेज में पढ़ा सकता था मगर विदेश में खास करके अमेरिका जैसे देश में, यह उसके बूते के बहार की बात थी। इसलिए जब विशाल को स्कालरशिप का ऑफर मिला तोह उसके माँ बाप की ख़ुशी की कोई सिमा नहीं थी। मगर फिर विशाल जाना नहीं चाहता था। उसका तर्क था के उसके पास कई जॉब ऑफर्स हैं और वो कोई नौकरी करके बहुत अच्छे से रह सकता है। लेकिन उसके माँ बाप नहीं माने। मानते भी कैसे, अमेरिका में उच्च पढ़ाई करने के बाद उनका बेटा जिस मुकाम को हासिल कर सकता था, पैसा, नाम सोहरत की जिस बुलन्दी को वो छू सकता था उस समय नौकरी करके कभी नहीं कर सकता था। आखिर विशाल ने अपने माँ बाप की जिद्द के आगे घुटने टेक दिए।

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा और धीरे धीरे विशाल की डिग्री के चार साल पूरे हो गये रिजल्ट आने से पहले ही उसे कई बड़े बड़े ऑफर आये जिनमे से उसने एक मल्टीनेशनल कंपनी का ऑफर स्वीकार कर लिया। चार साल पहले उसे जो ऑफर मिला था इस बार उसने उस ऑफर से दस् गुणा ज्यादा पाया था। एक्साम्स देते ही उसने नौकरी ज्वाइन करली। उसे अपना स्टडी वीसा अब वर्किंग वीसा में तब्दील करना था। अखिरकार एक्साम्स का रिजल्ट आ गेया, उसने हमेशा की तेरह टॉप किया था। उसका वीसा भी लग्ग चुका था। अब वो अपने माँ बाप को अपने पास बुला सकता था जिनसे मिलने के लिए वो तरसा हुआ था।


जीस दिन विशाल ने अंजलि को बताया के उसका वीसा लग्ग चुका है तो वो उसे जलद से जलद घर आने के लिए कहने लागी। खुद विशाल भी अपनी माँ से केह चुका था के वो वीसा लगते ही छुट्टी लेकर घर आ जाएग। मगर उस दिन ७थ जुलाई को वीसा लागने के अगले दिन, जब्ब उसने अपनी माँ को फ़ोन किया और उसने उससे बतायाके उसे एक और हफ्ता लगेगा तोह अंजलि का दिल टूट गेया। विशाल ने अगर पहले न कहा होता तोह कोई और बात होती मगर वो खुद अपनी माँ को बता चुका था के वीसा लगते ही वो महीने भर के लिए घर आने वाला है मगर अब वो अपनी माँ को कह रहा था के वो १४ जुलाई के बाद ही घर आ सकता था और वो वजह बताने में भी अनाकानी कर रहा था। अंजलि का दिल टूट गया। वो तोह कब्ब से एक एक पल गिण कर निकाल रही थी के कब्ब वो अपने जिगर के टुकड़े को देख पाएगी। एक हफ्ता उसके लिए एक सदी के बराबर था। उसने भरे गले से विशाल को यह कहा के "जब उसका मन करे वो तब्ब आए" फ़ोन काट दिया। 


विशाल यह देख कर के उसने अपनी माँ का दिल दुखाया था आतम गलानि से भर उठा उसने उसी समय टिकट का इन्तेज़ाम किया और उसी रात अपनी माँ को फ़ोन पर बताया के वो अगले दिन दोपहर तक्क दिल्ली में होगा। अंजलि का तोह जैसे ख़ुशी का ठिकाना ही न रहा वो पूरी रात सो न सकी और अगले दिन अपने पति को फ्लाइट उतरने के कई घंटे पहले ही एयरपोर्ट पर ले गायी। वो ख़ुशी के मारे लगभग नाचति फिर रही थी।

विशाल के बाहर आते ही जैसे ही वो भीड़ से थोड़ी दूर पहुंचा और उधर उसके माँ बाप उसके पास पहुंचे तोह उसने आगे बढ़कर अपनी रोती हुयी माँ को अपनी बाँहों में भर लिया। उसने उसे अपने सीने से भींच लिया। अंजलि और भी बुरी तेरह रो पढी। विशाल ने अपनी माँ से अलग होकर उसे देखा। उसके चेहरे से अभी भी आंसू बहे जा रहे थे। विशाल ने उसके चेहरे से आंसू पोंछे और उसे फिर से गले लगा लिया। उसकी खुद की ऑंखे नम हो चुकी थी।

माँ देख अब रो मत। अब आ गया हु ना तेरे पास ही रेहंगा। और तुझे अपने साथ ले जाऊंगा विशाल अपनी माँ के चेहरे को अपने हाथों में लेकर बोला
आंजलि अपनी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पोंछती है और खुद को कण्ट्रोल करने की कोशिश करती है। विशाल अपने बाप के पैर छूता है। उसका बाप उसे अशीर्वाद देता है, खुद उसकी ऑंखे भी नम हो चुकी थी। जलद ही विशाल का सामान गाड़ी में रखकर तीनो घर के लिए निकल पढते है। अंजलि की नज़र अपने बेटे के चेहरे पर तिकी हुयी थी। वो इतने प्यार और स्नेह से अपलक उसे देखे जा रही थी। वो अब रो नहीं रही थी। अब वो खुश थी। उसका चेहरा उस ख़ुशी से चमक रहा था। आज उसे संसार की सभी खुशियां सभी सुख मिल गए थे उसका बेटा उसके पास था, उसे और कुछ नहीं चाहिए था।
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03-20-2019, 12:10 PM,
#3
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
विशाल ने घर पहुंचते ही नहा लिया और अपना सामान खोलने लगा जबकि उसकी माँ ने उसके लिए हल्का फुल्का खाना बनाया क्योंकि विशाल ने खुद कहा था के वो जलद से जलद सोना चाहता है, उसकी ऑंखे नींद और थकन से बोझिल हो रही थी। ऊपर की मंजिल पर उसका कमरा तैयार था। खाना खाकर उसने अपने माँ बाप को वो ढेरों तोहफे दिए जिन्हें वो कब्ब से खरीद रहा था। वो तोहफे बेहद्द महंगे थे जिन्हे उसका बाप शायद अफ़्फोर्ड नहीं कर सकता था। उसके माँ बाप बेहद्द खुश थे। अखिरकार उसका बाप अंजलि को लेकर कमरे से बहार आ जाता है ताकि वो सो सके क्योंके अंजलि के वहां रहते शायद ही वो सो पाता। 

विशाल ने अकेला रह जाने पर एक गहरी सांस ली और मुसकरा पडा। अपनो के साथ उनके प्यार की गर्माहट में वो कितना सुखद महसूस कर रहा था। उसके मन को कितनी शान्ति थी, और उसके अंदर एक रोमांचकता से भरपूर ख़ुशी थी। विशाल ने ऑंखे बंद कर ली और जल्द ही लम्बे सफर की थकन और नींद ने उसे अपने आग़ोश में ले लिया। 


रात के लगभग आठ बज रहे थे जब अंजलि ने विशाल को जगाया। विशाल अभी भी सोने के मूड में था। मगर अंजलि ने उसे उठने के लिए मजबूर कर दिया। विशाल जब नाहा धोकर निचे पहुंचा तोह उसके माँ बाप उसका ही इंतज़ार कर रहे द। खाने के टेबल से स्वाधिष्ट खाने की प्यारी खुसबू आ रही थी। उसकी माँ ने उसके पसंद के खाने की सारी डीशेस से पूरा टेबल भर दिया था। विशाल मुसकरा उठा उसे बेहद्द तेज़ भूख लगी हुयी थी। एक बार जब वो सुरु हुआ तोह उसने इतना खाया जितना वो आम तौर पर दो वक़त के खाने में भी नहीं खाता था। अपनी माँ के हाथों के खाने के सामने उन फाइव स्टार होटल्स का खाना भी कुछ नहीं था जिनमे उसने नजाने कितनी बार खाया था। आज उसे महसूस हो रहा था के उसने पिछले चार साल में कितना कुछ मिस किया था। और साथ ही उसे खुद पर शर्मिंदगी भी महसूस हो रही थी के इतना प्यार करने वाली माँ से वो अभी और समय दूर रेहना चाहता था। 

खाने के बाद वो अपने पीता से बाते करने लगता है। वो अपनी कंपनी और नौकरी के बारे में बता रहा था। और उसकी बातें सुन कर उसके बाप को उस पर फखर होता जा रहा था। उसका बेटा अब बड़ा आदमी बन चुका था। जितना वो एक साल में भी नहीं कमा सकता था, विशाल उससे ज्यादा एक महीने में कमा सकता था।

कफी देर बाद विशाल जब अपने कमरे में गया तोह उसने अपना बैग खोले और अपना सामान सेट करने लगा उसने अभी तक्क अपना बैग भी नहीं खोला था। आधे घंटे बाद जब वो फ्री हुआ तोह उसकी माँ उसके लिए दूध लेकर आ गायी। विशाल मुसकरा पडा पुराणी यादें ताज़ा हो गायी। विशाल बेड पर बैठा बैठा दूध पि रहा था जबके अंजलि रूम में घूम रही थी और फिर वो बेड पर उसके पास बैठ गयी। वो उसे बड़े धयान से देख रही थी। 

ऐसे क्या देख रही हो माँ? विशाल मुस्कराते हुए पूछता है।

"देख रही हुन मेरा बेटा कितना जवान कितना बड़ा हो गया है".अंजलि का चेहरा खिला हुआ था। वो विशाल के गाल पर हाथ फेर रही थी।

"मगर फिर भी तुमने एक ही नज़र में पहचान लिया"। मा का स्पर्श कितना प्यारा कितना गर्माहट भरा था।

"हुन तोह क्या में अपने बच्चे को नहीं पहचानती"।

"मगर माँ में तुम्हे नहीं पहचान सका मेरा मतलब मैंने तुम्हे पहचान तोह लिया था मगर एक पल के लिए मुझे यकीन ही नहीं हुआ तुम कितनी बदल गयी हो "। विशाल अपनी माँ के बदन पर निगाह दौडता बोल।

"मतलब।मुझमेंकेसा क्या फरक आ गया है"।अंजलि मुसकरा उठि थी। वो जन्ति थी के उसमे क्या फरक आ चुक्का था क्योंके उसे यह बोलने वाला विशाल अकेला सख़्श नहीं था बल्कि वो कई लोगों के मुंह से यह सुन चुकी थी।

"मतलबतुम कितनी पतली हो गयी हो माँ यकीन नहीं होता सच मै और तुम कितनी सुन्दर दिख रही हो"। विशाल अपनी माँ के चेहरे को हैरत से देखता केहता है।

"मतलब पहले में बदसूरत थी". अंजलि हँसते हुए केहती है।

"नहीं माँ तुम जानती ही मेरा वो मतलब नहीं था मगर अब इतना वजन कम् करने के बाद तो तुम एकदम जवान लग रही हो जैसे के तुम सिर्फ तीस की हो सच मैं" अंजलि हंस पड़ती है। 

"बस घर पर कुछ करने के लिए नहीं था इसीलिए थोड़ा बहुत एक्सरसाइज करनी सुरु कर दि एक बार सुरुआत करने के बाद तोह बास मुझे इतना अच्चा लाग्ने लगा के में ज्यादा से ज्यादा वजन कम् करने की कोशिश करने लगी मगर वो सभ छोड़ो मुझे यह बतायो के तुम्हारी दोस्ती किसी लड़की से भी हुयी क्या मैने तोह जैसा अमेरिका के बारे में सुना था मुझे डर लगता था कहीं कोई गोरी मेम तुम्हे हमसे छीन ही न ले".

"अरे माँ वहां मुझे कोई भी गोरी ऐसी नहीं मिली जो तुम जैसी सुन्दर हो अगर तुम जैसी मिल जाती तोह में सचमुच शायद वापस नहीं आता". विशाल हँसते हुए मज़ाक़ करता है।

"बेशरम"अंजलि बेटे के बाजु पर चापट मारती है। 

दोनो माँ बेटा इसी तेरह बाते करते रेह्ते है। कब्ब रात के गयारह बाज्ज जाते हैं उन्हें पता ही नहीं चलता। अखिरकार अंजलि अपने बेटे का माथा चूम कर उसे गुड नाईट केहती है और वहां से रुख्सत होती है।

विशाल को लगा था के सायद दोपहर को सोने के बाद उसे इतनी जल्दी नींद नहीं आएगी। मगर खाने और सफर की अधूरी थकन ने उसे कुछ ही पलों में गहरी नींद में पहुंचा दिया।
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03-20-2019, 12:11 PM,
#4
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
विशाल जाग चुका था मगर अब भी कच्ची नींद में था जब अंजलि उसके कमरे में आयी। वो बेड पर विशाल के सिरहाने बैठकर उसके चेहरे पर हाथ फेरने लगी और उसे प्यार से बुलाने लागी। विशाल ने ऑंखे खोली मगर फिर तरुंत बंद करदि। वो सोना नहीं चाहता था मगर माँ का प्यार भरा स्पर्श उसे इतना सुखद लग रहा था के वो यूँ ही उसे महसूस करते रहना चाहता था। उस समय विशाल अपनी माँ की तरफ करवट लेकर लेता हुआ था और उसने अपनी टाँगे मोडी हुयी थी।

आंजलि लगातार बेटे के गालों को सेहलती अपना हाथ फेरती रहती है। विशाल ऑंखे बंद किये लेटा रहता है। दस् मिनट बाद अंजलि झुक कर विशाल के गाल को चूमती है और उसे धीरे से उठने को केहती है। विशाल ऑंखे खोल देता है। वो करवट बदल कर सिधा होता है और एक ही झटके में अपने ऊपर से चादर हटा देता है। 

कुछ ही पल मे अंजलि की ऑंखे फैल जाती है। उसका मुंह खुल जाता है। उसकी सांस रुक जाती है। विशाल का ध्यान अपनी माँ के चेहरे की और था। जब्ब वो अपनी माँ के चेहरे के भाव एक सेकंड में यूँ बदलते देखता है तो हैरान हो जाता है। वो वहीँ रुक जाता है और उसे समज नहीं आता के क्या हो गया है। वो अपनी माँ की नज़र का पीछा करता अपने बदन पर देखता है। उसके होश उड़ जाते है। वो पूरा नंगा था। और उसकी खुली टैंगो के बिच उसका लम्बा मोटा लुंड हर सुबह की तरह पूरी तराह आकड़ा हुआ सिधा खडा था। विशाल अपनी माँ को देखता है जो उसके लंड को देख रही थी। अचानक विशाल को होश आता है और वो झटके से चादर खींच खुद को ढकता है और दूसरी तरफ को करवट ले लेता है। 
"गुड मॉर्निंग मा आय ऍम सो सॉरी माँ मुझे उफ्फ याद ही नहीं रहा में वहां ऐसे ही सोता था उउफ्फ्फ माफ़ करदो माँ".विशाल शर्मिंदगी से अंजलि की तरफ पीठ किये खुद को कोस रहा था के वो कैसे भूल गया के वो घर पर है न के अमेरिका के अपने फ्लैट में।

आंजली स्तब्ध सी खड़ी थी। जब्ब विशाल माफ़ी मांगता है तोह वो भी होश में आती है। वो एक पल को समझने की कोशिश करती है के क्या हुआ है मगर अगले ही पल वो हंस पड़ती है। वो इतना खुल कर ऊँचा हँसति है के विशाल की शर्मिंदगी और भी बढ़ जाती है।

विशाल को शायद इतना नहीं मालूम था के उसने अपनी माँ की तरफ से करवट तोह ले ली थी और अपने जिसम का आग्र भाग चादर से ढँक लिया था मगर उसकी पीठ पर चादर उसके नीचले कुल्हे को नहीं ढँक सकी थी। अंजलि उसे देखति है तो और भी ज़ोरों से हंस पड़ती है। 

"ऊऊफफफ माँ हँसो मत जाओ यहाँसे से प्लीज जाओ भी". विशाल अपनी माँ की मिन्नत करता है। अंजलि की खिलखिलाती हँसी उसकी शर्मिंदगी को और बढा रही थी।

ताभी अंजलि को नजाने क्या सूझता है, के वो शरारत के मूड में आकर बेड पर हाथ रखकर झुकति है और ज़ोर से विशाल के नग्न कुल्हे पर चपट मारती है।
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03-20-2019, 12:11 PM,
#5
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
विशाल अपने नंगे कुल्हे पर अपनी माँ के हाथ का स्पर्श पाकर चीख़ पढता है। वो तरुंत हाथ पीछे करके चादर को अपने कुल्हों के निचे दबाता है। अंजली हँसते हँसते लोट पॉट हो जाती है। वो अपने पेट् पर हाथ रखकर दबाती है। उसे इतना ज़ोर से हंसाने के कारन पेट् में दरद होने लगा था। 

अंजलि आखिरकार हँसते हुए दरवाजे की और बढ़ती है। रेह रेहकर वो ज़ोरों से हंस पड़ती थी। वो अपने पीछे दरवाजा बंद कर देती है और किचन की और जाती है। अभी भी हँसी से उसका बुरा हो रहा था। वो बेटे के लिए नाश्ता बनाना चालू करती है।

हँसि और एक अजीब सी ख़ुशी में, एक रोमाँच में अंजलि यह महसूस नहीं कर पा रही थी के उसके निप्पल अकड गए थे, उसकी चुत कुछ नम्म हो गयी थी।

विशाल नाहा धोकर फ्रेश होता है। पिछली पूरी दोपहर और फिर रात भर सोने के बाद अब उसके बदन से थकन पूरी तेरह उतार चुकी थी और वो खुद को एकदम फ्रेश महसुस कर रहा था। उसने एक पायजामा और शर्ट पेहन ली। निचे किचन से उसकी माँ उसे नाश्ते के लिए बुला रही थी। विशाल अपने बाल संवार कर कमरे से बहार निकलता है और सीढियाँ उतरता निचे किचन की और जाता है।

विशाल बहुत धीरे धीरे कदम उठा रहा था। सुबह सुबह जो कुछ हुआ था उसके बाद से अपनी माँ के सामने जाते बहुत शर्म महसूस हो रही थी। उसकी माँ ने उसे पूरी तरह नंगा देख लिया था और ऊपर से उस समय उसका लौडा भी पूरा तना हुआ था जैसे अक्सर उसके साथ सुबह के समय होता था। हालाँकि उसकी माँ ने कोई बुरा नहीं माना था, कोई गुस्सा भी नहीं किया था लेकिन उसे शर्म तोह फिर भी महसूस हो रही थी। लेकिन अब माँ का सामना तोह करना ही था, इस्लिये वो धीरे धीरे कदम उठता किचन की और जाता है। 

अंजलि बेटे की पदचाप सुनकर दो ग्लासेज में चाय डालती है। विशाल जब्ब किचन में दाखिल होता है तोह अंजलि झुकि चाय दाल रही थी। विशाल डाइनिंग टेबल की कुरसी पर बैठ जाता है। उसकी माँ उसके सामने चाय और एक प्लेट में खाने का सामन रखती है। वो विशाल के बिलकुल सामने टेबल के दूसरी और बैठ जाती है।

अंजलि के होंठो पर गहरी मुस्कराहट थी। विशाल सर झुककर चाय पि रहा था। भले ही उसने सर झुकाये हुआ था मगर वो अपनी माँ की मुस्कराहट को महसूस कर सकता था। उसके गालों पर हलकी सी शर्म की लाली थी। दोनों चुप्प थे। विशाल को वो चुप्पी बहुत चुभ रही थी जबके अंजलि बेटे की हालत पर मुसकरा रही थी। विशाल कुछ कहना चाहता था ताकि उसका और उसकी माँ का धयान जो अभी थोड़ी देर पहले उसके बैडरूम में हुआ था, उससे हट सक। मगर वो कोनसी बात करे, क्या कहे उस समज नहीं आ रहा था।

"मा पिताजी चले गए क्या?" विशाल को जब्ब कुछ ओर नहीं सूझता तोह वो यहीं पूछ लेता है। उसकी नज़र झुकि हुयी थी।

"हूँह् हा वो चले गये" उसकी माँ हिचकियों के बिच बोल रही थी। विशाल चेहरा ऊपर उठता है तोह अपनी माँ को हँसते हुए देखता है। वो खींघ उठता है।

"म अब बस भी करो तुम भी ना" विशाल रुष्टसा सा बोलता है।

"सररी........ सोर्री............." अंजलि अपने मुंह से हाथ हटा लेती है और अपनी बाहें टेबल पर रख गम्भीर मुद्रा बना लेती है। विशाल उसकी और देखकर नाक भौंह सिकोड़ता है क्यों आए उसे मालूम था के वो जानबुझ कर नाटक कर रही थी। अंजलि बेटे के चेहरे की और देखति है और अचानक वो फिर से खिलखिला कर हंस पड़ती है। वो टेबल पर अपनी कुहनियों पर सर रख लेती है और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगती ही। उसका पूरा बदन हिल रहा था। वो अपना चेहरा ऊपर उठती है। हँसि से उसका बुरा हाल था। उसकी ऑंखे भर आई थी। पेट् में दरद होने लगा था। विशाल की खींज और बढ़ जाती है। मगर जब्ब अंजलि अपने हाथ इंकार में हिलाती खुद को रोक्ति है और फिर ज़ोरों से हंस पड़ती है तोह विशाल अपना चेहरा अपने हाथों से ढँक लेता है। ओर फिर वो भी हंसने लगता है। अंजलि की हँसी और भी ज़ोरदार हो जाती है। 

मा बेटे को शांत होने में कुछ वक़त लगता है। दोनों चाय ख़तम करते है। अंजलि किचन में बर्तन ढ़ोने लगती है जबके विशाल अपने कमरे में आ जाता है। वो अपने पुराने दोस्तों को फ़ोन करने लगता है। उसके सभी दोस्त उससे मिलने के लिए बेताब थे मगर जिस दोस्त की उसे तलाश थी वो उसे नहीं मीली। उसकी शादी हो चुकी थी और वो दूसरे शहर जा चुकी थी। विशाल से उसके बहुत गेहरे सम्बन्ध थे। एक वही लड़की थी जिसके साथ विशाल का लम्बा अफेयर चला था। विशाल ने उसके लिए अमेरिका से एक खास और बहुत महंगा उपहार लिया था जो उसे उम्मीद थी बहुत पसंद आने वाला था मगर अब वो तोह जा चुकी थी। अगर विशाल कोशिश भी करता तोह इतने सालों बाद हो सकता है उसके दिल में विशाल के लिए कोई जगह न बची हो। आखिर विशाल ने उसे कभी फ़ोन तक्क तो नही किया था और ऊपर से वो अब शादिशुदा थी। विशाल को लगा था के वो कोशिश करके पुराने रिश्ते को फिर से जिन्दा कर लेगा मगर अब तोह उसे कोशिह करना भी बेकार लग रहा था। विशाल का मन थोड़ा उदास हो विशाल का मन थोड़ा उदास हो जाता है। उसका दिल कुछ करने को नहीं हो रहा था तोह वो अपना लैपटॉप खोलकर म्यूजिक सुन्ने लगता है। 
कोई दो घंटे बाद घर का सारा काम निपटा कर नाहा धोकर अंजलि बेते के कमरे में दाखिल होती है। उसके हाथ में एक जूस का गिलास था। वो टेबल पर गिलास रख देती है। विशाल क्योंके हेडफोन्स लागए ऊँची आवाज़ में म्यूजिक सुन रहा था तोह उसे अपना माँ के आने का पता नहीं लगता है। वो गिलास के टेबल पर रखने के समय आवाज़ से अपनी ऑंखे खोलता है और अपनी माँ को देखकर मुसकरा पढता है। उसे अब सुबह की तेरह श्रम नहीं आ रही थी। वो म्यूजिक बंद कर देता है और दूसरी कुरसी खीँच कर अपनी माँ को अपने पास बैठने के लिए केहता है। 

अंजलि ने एक पतली सी साड़ी पहनी हुयी थी। उसका ब्लाउज स्लीवलेस था बल्कि ब्लाउज की गहरी लाल पट्टियाँ उसकी गर्दन से चिपकी हुयी थी। साड़ी के ऊपर लाल रंग के फूल बने हुए थे। हालाँकि अंजलि ने साड़ी से अपने सामने का पूरा बदन ढका हुआ था मगर विशाल एक कोने से देख सकता था के उसकी माँ का वो ब्लाउज कितना छोटा था। वो उसके सीने से हल्का सा निचे तक्क आता था और उसपर से उसने अपनी साड़ी काफी निचे बांधी हुयी थी। उसका पेट् काफी हद्द तक्क नंगा था और विशल उसको साड़ी के पतले पल्लू से झाँकता देख सकता था। उसकी माँ ने बड़े ही आधुनिक तरीके से बाल कटवाये हुए थे जो उसकी पीठ पर उसकी बग़लों तक्क ही आते थे। उसने कानो और अपने हाथ में एक ही डिज़ाइन के गेहने पहने हुए थे जब के दूसरे बाजु पर लाल रंग का धागा बंधा हुआ था। विशाल अपनी माँ को देखता ही रह गया। वो कितनी सुन्दर है शायद उसने जिंदगी में पहली बार महसूस किया था।
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03-20-2019, 12:11 PM,
#6
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
तोह कैसा महसूस हो रहा है इतने सालों बाद वापस घर लौटकर?" अंजलि अपने बालों को झटकती पूछती है। 

"हम्म्म्मम् बहुत अच्चा लग्ग रहा है माँ बहुत अच्चा लग्ग रहा है। वहाँ तोह खुदही सारे काम करने पढते हैं खुद ही खाना बनाओ खुद ही कपडे धोओ खुड इस्त्री करो सभी कुच" विशाल अपनी अमेरिका की जिन्दगी के संगर्ष को याद करता ठण्डी आह भर्ता है। "मगर यहाँ कितना मज़ा है.......कपडे धुले हुये.....गरमा गरम ताज़ा खाना तय्यार सभी कुच......" विशाल मुस्कराता है।

"यह तोह तुझे घर आने कि, हमसे मिलने की ख़ुशी नहीं है...बलके तुझे राहत महसूस हो रही है के तेरा काम करने के लिए घर पर नौकरानी है....हुँह?" अंजलि मुस्कराती बेते से सिकायत करती है।

"हूँ माँ तुम बिलकुल ठीक कह रही हो" विशाल हँसता हुआ कहता है तोह अंजलि उसकी जांघ पर ज़ोर से मुक्का मारती है। विशाल और भी ज़ोर से हंस पढता है।

"ख़ाने का तोह में मान लेती हुण वैसे मुझे समज में नहीं आता तू खाना बनाता कैसे था मगर कपड़ों का तोह तू झूठ बोलता लगता है.....जब कपडे पहनोगे नहीं तोह धोयोगे कहाँ से?" अंजलि मुस्कराती चोट करती है।

"माssss" विशाल नाराज़गी भरे लेहजे में अपनी माँ को टोकता है। अब हंसने की बरी अंजलि की थी। 

"क्या मा.....आप फिर से...." विशाल के गाल फिर से शर्म से लाल हो जाते है। उसकी नज़रें झुक जाती है। "वो अब अमेरिका में अकेला रहता था इसीलिए वहां यह आदत पढ़ गइ कल मुझे याद ही नहीं रहा के में घर पर हुण "

"अर्रे तोह इसमें शरमाने की कोनसी बात है" अंजलि विशाल की शर्मिंदगी का मज़ा लेते चटख़ारे से बोलती है। उसे बेटे को सताने में बेहद्द मज़ा आ रहा था। "मैने कोनसा तुझे पहली बार नंगा देखा है तूझे खुद अपने हाथों से नेहलाती रही हुन, धोती रही हुन, स्कूल के लिए तैयार करती रही हुण भूल गया क्या" 

"मा......अब में तुम्हारा वो छोटा सा बेटा नहीं रहा बड़ा हो गया हुण" इस बार विशाल अपनी नज़र उठकर अपनी माँ से केहता है।

"हनणण यह तोह मैंने देखा था सुबह तू सच में बड़ा हो गया है बलके बहुत, बहुत बड़ा हो गेय है और" अंजलि अपने नीचला होंठ काटती विशाल को आंख मारती है "मोटा भी बहुत हो गया है।" 

विशाल एक पल के लिए अवाक सा रह जाता है। वो विश्वास नहीं कर पा रहा था। जिस अंदाज़ से अंजलि ने उसे कहा था, और वो लफ़ज़ कहने के समय जो उसके चेहरे पर भाव था खास कर जब्ब उसने बेटे को अंख मारी थी, उससे विशाल को लगा था के उसकी माँ का इशारा उसके लंड की और था मगर यह कैसे हो सकता था वो भला ऐसे कैसे कह सकती थी वो तोह उसकी माँ थी।......


"वैसे मुझ लगता है ग़लती मेरी है। मुझे सच में कभी ख्याल ही नहीं आया के मेरा बीटा अब जवान हो गया है के मुझे अब दरवाजे पर दस्तक देनि चहिये" अंजलि बेटे को सोच में डुबता देख बोलती है। फिर अचानक से वो अपनी कुरसी से उठती है और विशाल के ऊपर झुकति है। विशाल आरामदेह कुरसी पर पीछे को अधलेटा सा बैटा था। इसलिए अंजलि ने उसके कन्धो पर हाथ रखे और फिर अपने होंठ उसके माथे पर रखकर एक ममतामयी प्यार भरा चुम्बन लिया। 

"सच में मालूम ही नहीं चला तू कब्ब जवान हो गया" फिर वो वापस अपनी कुरसी पर बैठ जाती है। विशाल अपने मन को भटकने से रोकना चाहता था मगर अपने सीने पर अपनी माँ के उभारों का दबाव अब भी उसे महसूस हो रहा था। सायद वो उस दबाव को कभी मेहुस नहीं करता अगर उसकी माँ ने कुछ समय पहले शरारत से वो अलफ़ाज़ न कहे होते।

"मा तुमहे दस्तक वासतक देणे की कोई जरूरत नहीं है। तुम जब्ब चाहो बेहिचक मेरे कमरे में आ सकती हो" विशल अपनी माँ के हाथ अपने हाथों में लेता बोल।

"हान में सीधी कमरे में घुश जायूँ और तू सामने नंगा खडा हो" अंजलि मुस्कराती है।

"वुफफुआ मा अब छोडो भी। तुम्हे कहा न वहा अकेला रहता था, इस्लिये कुछ ऐसी आदतें हो गायी अब ध्यान रखुंगा अपनी आदतें बदल लुँगा बस्स" अंजलि बेटे की बात पर मुसकरा पड़ती है। विशाल उसके हाथों को अपने हाथ में लिए बहुत ही कोमलता से सहला रहा था। अंजलि अपना एक हाथ उसके हाथोंसे छुडा कर उसके गाल को सहलती है। उसका चेहरा पुत्रमोह से चमक रहा था। 

विशाल को अब समज में आता है के वो क्यों इतना मुसकरा रही थी, क्यों वो कमरे में उसे नंगा देखने पर हंसने लगी थी। वो खुश थी। वो बहुत खुश थी। बेटे के आने से उसे इतनी ख़ुशी थी के उसे जब्ब भी छोटा सा मौका भी मिलता वो मुसकरा उठती थी, हंस पड़ती थी। शायद उसने बहुत समय से अपनी हँसी अपनी ख़ुशी बेटे के भविष्य के लीय दबाये रखी थी।

"मै समजती हुन बेटा मुझे दुःख होता है के तुम्हे इतनी सारी तकलीफे झेलनी पडी। तुम्हे दिन रात कितनी मेहनत करनी पड़ी मुझे एहसास है बेटा। तुम नहीं जानते जब्ब में तुम्हारे बारे में सोचती थी और मुझे एहसास होता था के तुम वहां अकेले हो इतने बड़े देश में, उन अंजान, पराए लोगों के बिच और तुम्हारा ख्याल रखने वाला कोई नहीं है तो मुझे कितना दुःख होता था।" अंजलि अचानक गम्भीर हो उठती है।
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03-20-2019, 12:11 PM,
#7
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
माँ........तुम्हारे बेटे के लिए ऐसी कठिनाइयँ कोई मायने नहीं रखती बस मुझे अगर दुःख था तोह यह था के तुम मेरे पास नहीं थी" इस बार विशाल अपनी कुरसी से उठता है और अपनी माँ के चेहरे पर झुककर उसका चेहरा ऊपर को उठाता है. फिर वो अपने होंठ उसके चेहरे की और बढाता है. अंजलि अपना चेहरा हल्का सा झुककर अपना माथा उसके सामने करती है मगर वो दांग रह जाती है क्योंके विशाल के होंठ उसके माथे को नहीं बल्कि उसके गाल को छूते है. उसके हलके से नम्म होंठ जैसे ही अंजलि के गाल को छूते हैं वो सेहर उठती है. विशाल भी अपनी माँ के जिस्म में कुछ तनाव को महसूस करता है. उसे लगता है के शायद उसे यह नहीं करना चाहिए था. मगर जब चूमने के बाद वो अपना चेहरा ऊपर उठता है तो अंजलि को मुस्कराते हुए देखता है. वो राहत की गहरी सांस लेता है.

"मगर अब में बहुत खुश हु......जब वो वक़त गुज़र चुका है मैं........जब तुम्हारा बेटा तुम्हारे साथ रहेग.....हमेशा..." विशाल चुम्बन के बाद कुरसी पर वापस बैठता हूए बोलता है.


"हा बेटा...........में बहुत खुश हुन के तुम लौट आये हो.........तुम्हारे बिना यह घर घर नहीं था, तुम लौटे हो तो इस घर में खुशियां लौटी हैं........." अंजलि के चेहरे पर फिर से मुस्कराहट लौट आई थी.
"मैं भी बहुत खुश हुन मैं........सच में मैं........यहा आकर दिल को कितनी ख़ुशी मिली है में तुम्हे बता नहीं सकता........" विशाल कुरसी पर आगे को थोड़ा सा झुक कर अपनी माँ के हाथ अपने चेहरे पर लगता है. 

"ईसिलिये अभी एक हफ्ता और लेट आना चाहता था?...........इतने सालों बाद जब मुझसे एक पल के इंतज़ार नहीं होता था तू पूरे एक हफ्ते के लिए मुझे तड़पाना चाहता था.........." अंजलि अपना रोष झाड़ती है.

"उफ्फ मा..........वहाँ एक फेस्टिवल था १४ जुलाई को........मेरे कॉलेज के सभी दोस्तोँ ने मुझे इनवाइट किया था........वो बहुत ज़ोर दे रहे थे........." विशाल ऑंखे झुकाए शर्मिंदगी से केहता है

"यह तो दोस्तों का इतना ख्याल था और में जो यहाँ तड़प रही थी उसका कुछ नही........." 

"मा अब छोड़ न ग़ुस्से को........जब देख आ तो गया हु तेरे पास.........." विशाल अपनी माँ के हाथों को चूमता है.

"हा, जब्ब मैंने गुस्सा किया तो आया था.......खेर छोड़........कोंसे फेस्टिवल था.......यूनिवर्सिटी की और से था क्या?.........." 

"नही माँ, वहा के लोग मनाते हैं........एक दूसरे को इनवाइट करते हैं.............बस थोड़ी पार्टी होती है.......मौज़, मस्ति, खाना वगैरेह" 

"नाम काया है फेस्टिवल का?..........." अंजलि पूछ बैठती है.

"अब छोडो भी माँ फेस्टिवल को...........तुम कहीं जा रही थी क्या?............." विशाल बात बदलता है.

"हम..... नहीं तो क्यों?" 

"तुम इतनी सजी सँवरी हो........मुझे लग शायद किसी पार्टी वग़ैरह या फिर शॉपिंग पे जा रही हो.........".
"चल हट.......मा को छेडता है.....कया सजी साँवरी हुन..........मैने तोह कुछ मेकअप भी नहीं किया.........और यह साड़ी तुमारे पिताजी ने दी थी...........तीन साल पहले........" अंजलि कुछ शरमाती सी कहती ही.

"मगर देखने में कितनी सुन्दर लगती है.......मा तुम पर बहुत जंचती है...........एकदम मधुरी की तरह दीखती हो........." विशाल मुस्कुराता कह उठता है. 

"बस कर.........बातें न बना.........." अंजलि बेटे को झिड़कती है मगर उसका चेहरा खील उठा था. "तु बता तुझे तोह कहीं जाना नहीं है ना..........." 

"जाना है माँ......कुच दोस्तों को फ़ोन किया था......शाम को मिलने का प्लान है.........." 

"थीक है.....जाकर घूम फिर आओ......मगर मेरी एक बात याद रखना, घर से खाना खाकर जाना है और घर पर लौटकर ही खाना है......बाहर से खाया तोह तुम्हारी खैर नही......." अंजलि बेटे को चेताती है.

"मा वो तोह में वैसे भी नहीं खानेवाला जो स्वाद तुम्हारे हाथों में है... वो दुनिया में और कहा.........."

"हम्म तोह ठीक है.........तुम आराम करो.........मुझे लंच की तयारी करनी है.......तुम्हारे पिताजी भी आज खाना खाने घर आ रहे है......." अंजलि कुरसी से उठने के लिए आगे को झुकति है तोह छोटे और ऊपर से तंग ब्लाउज में कसे हुए उसके भारी मम्मे विशाल की आँखों के सामने लहरा उठते है. विशाल का दिल नजाने क्यों धड़क उठता है. मम्मो का आकार और ब्लाउज का छोटा होना एक वजह थी मगर असल वजह थी जिससे अंजलि के मम्मे और भी बड़े और उभरे हुए दिख रहे थे वो थी उसकी सपाट और पतली सी कमर. उसकी २८ की कमर पर वो मोठे मोठे मम्मे क़यामत का रूप बने हुए थे. उसका ब्लाउज वाकई में काफी छोटा था. लगभग पूरा पेट् नंगा था.
अंजलि बेटे से रुख्सत लेने के लिए खड़ी होती है।
आंजलि उठ कर अपने बालों में हाथ फेरती है। विशाल अपनी माँ की सुंदरता में खोता जा रहा था। अंजलि मूढ़ती है और दरवाजे की और बढ़ती है। विशाल उसकी पीथ देखता है। उसकी पीथ केबेहद्द छोटे से हिस्से को उसके ब्लाउज ने धका हुआ था बाकि सारी पीथ नंगी थी। दुध जैसी रंगत और उसके ऊपर लहराते स्याह काले बाल।

"मा.........." अचानक विशाल अंजलि को पीछे से पुकारता है।

"हुँह?" अंजलि दरवाजे को खोल कर बाहर निकलने वाली थी। वो रुक कर बेटे की और सवालिया नज़रों से देखति है।

"मा तुम बहोत सुन्दर हो.....बहुत....बहुत ज्यादा सुन्दर.....मुझ मालूम ही नहीं था मेरी माँ इतनी सुन्दर है।" विशाल सम्मोहित सा कह उठता है। 

"बुद्धु कहीं का....." अंजलि मुस्कराती हुयी बाहर निकल जाती है। सीढ़ियां उतारते हुए उसका चेहरा हज़ार वाट के बल्ब की तेरह चमक रहा था।
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03-20-2019, 12:11 PM,
#8
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
उस दिन दोपहर के खाने के बाद विशाल अपने दोस्तोँ से मिलने निकल गया। इतने सालों बाद विशाल को देखकर उसके दोस्त बहुत खुश हुये। सभी ने विशाल को जबतदस्त क़ामयाबी की बधायी दि। उसके बाद उन दोस्तोँ के बिच देश परदेश की बातें चल निकली। उनकी बातें ज्यादातर लड़कियों को लेकर ही थी। विशाल ने अपनी क्लास और मोहल्ले की सभी लकियों के बारे में पुछा, दोस्तों से उनकी लाइफ के बारे में और उसके दोस्तों ने अमेरिका की उसकी जिंदगी के बारे में। आखिर में सभी दोस्त मिलकर फिल्म देखने के लिए गए। विशाल जब्ब घर लौटा तोह काफी देर हो चुकी थी। उसके माता पीता दोनों खाने के लिए उसका इंतज़ार कर रहे द। 

विशाल को इतनी देर से आने के लिए माँ की डांट सुन्नी पडी। वो कब्ब से भूखे उसी का इंतज़ार कर रहे थे। भूख विशाल को भी बेहद्द लगी थी। उसने दोस्तोँ के बार बार कहने के बावजूद खाना नहीं खाया था और इसी बात से अंजलि को थोड़ी ख़ुशी हुयी थी के उसके बेटे ने उसकी बात मणि थी वार्ना उसे डर था के वो दोनों उसके लिए भूखे हैं और वो सायद बाहर से खाकर आने वाला था।

खाने के बाद विशाल का पीता अपने बैडरूम में चला जाता है और विशाल ऊपर अपने बैडरूम में। कुछ देर बाद अंजलि विशाल के कमरे में दूध का गिलास थामे दाखिल होती है। उसने अभी भी दोपहर वाली साड़ी पहनी हुयी थी। विशाल बेड पर लैटा हुआ था। दोस्तों के साथ घूम फिर कर बहुत थक गया था और उसे नींद भी आ रही थी मगर अंजलि के कमरे में आते ही उसकी नींद हवा हो गयी। मा बेटा दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कराते है। 

विशाल उठ कर बेड से टेक लगा लेटता है और अंजलि उसे दूध का गिलास देकर खुद बेड पर उसके सामणे, उसके पास बैठ जाती है। विशाल दूध पीता है और अंजलि उसे सवाल करती रेहती है। वो कई बातें अपनी माँ को पिछली रात को ही बता चुका था मगर उनको दोहरने में उसे कोई हरज़ नहीं था। उसकी माँ सिर्फ उससे बातें करना चाहती थी, उसके साथ समय बीताना चाहती थी और वो भी दिल से एहि चाहता था। घन्टे भर बाद जब्ब विशाल को जमाहिया आने लगी तोह अंजलि उठने लगी। 

"अभी रुको ना माँ ......कया जल्दी है.........अभी थोड़ी देर और बातें करते है........." विशाल अपनी माँ को रोक्ने की कोशिश करता है।

"अभी तुम्हे नींद आ रही है.......और फिर मुझे सुबह जल्दी उठना है........तुमहारे पापा के लिए नाश्ता बनाना होता है......तुम आराम करो, कल्ल दिन में बात करेंगे......"

विशाल कुछ बोल नहीं पाता। नींद उसे जरूर आ रही थी मगर वो अभी सोना नहीं चाहता था। अंजलि आगे को झुक कर उसके माथे पर चुम्बन अंकित करती है। इस बार विशाल अपनी माँ की तरफ करवट लेकर लेटा हुआ था, उसे अपने कंधे पर वो बेहद्द कोमल गर्माहट भरा दवाब महसू होता है। वो अपनी आँखों के सामन अपनी माँ के ब्लाउज में कसकर बँधे हुए ख़ज़ाने को देखता है तोह उसके लंड में तरुंत कुछ हलचल सी होती है। अंजलि बेड से निचे उतरती है। 

"और हान, एक बात और" अंजलि के होंठो पर फिर से दोपहर वाली मुस्कराहट लौट आती है। "तुम अगर चाहो तोह्......बिना कपड़ों के सो सकते हो......तुमहारे पीता के बारे में तोह में केह नहीं सकती मगर मुझे कोई ऐतराज नहीं है........" अंजलि हँसति हुयी कहती है।

"मा आप फिर से......" विशाल अपनी बात पूरी नहीं कर पाता। अंजलि उसके होंठो पर अपनी ऊँगली रखकर उसे बिच में ही चुप करा देती है।

"बेटा अब तुम बड़े हो गए हो..........अपना बुरा भला खुद समज सकते हो....तुमहे सिर्फ हमारे लिए अपनी आद्तों को बदलने की जरूरत नहीं है.....अगर तुम्हे बिना कपड़ों के सोना अच्छा लगता है तोह इसमें कोई बड़ी बात नहीं है........तुम अपनी सहूलियत से रहो.........बस थोड़ा सा अपने पीता का ख्याल रखना......तुम जानते ही हो उन्को......में अपनी तरफ से कोशिश करुँगी के तुम्हारी जाती जिन्दगी में दखल न दे सकु......और तुम्हे मेरे कारन कोई असुबिधा न हो और तुम बिलकुल अमेरिका की तरह फ्री होकर रेह सको......" अंजलि के होंठो पर मुस्कराहट थी मगर विशाल जानता था के उसकी माँ उसे गम्भीरता से केह रही थी। 

"थैंक्स मा" विशाल और भी कुछ कहना चाहता था मगर अंत-ताः वो सिर्फ उसे थैंक्स बोल कर ही रुक जाता है। अंजलि उसके गाल को प्यारसे सहलाती है और फिर कमरे से बाहर निकल जाती है।

विशाल को अब नींद नहीं आ रही थी। जमहाइया भी नहीं आ रही थी। वो अपनी माँ को लेकर सोच रहा था। वो हर तरह से बदलि हुयी लग्ग रही थी। वजन घटाने के बाद वो एकदम जवान दिखने लगी थी, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था के वो एक जवान बेटे की माँ भी है। मगर उसके सवभाव में भी बहुत बदलाव था। विशाल के साथ उसका व्यबहार पहले से काफी बदल चुका था। वो अब भी पहले की तरह उसकी माँ थी उसकी देखभाल करती थी, उसके लिए बढ़िया से बढ़िया खाना बनाती थी, उसकी हर जरूरत पूरी करती थी। मगर पहले वो सिर्फ एक माँ की तरह उससे पेश आती थी जबके अब वो उसके साथ एक माँ के साथ साथ एक दोस्त की तेरह पेश आती थी। उनके बिच एक खुलापन आ चुका था जो पहले नहीं था। जा तोह वो इस बात को स्वीकर कर चुकी थी के बेटाअब जवान हो चुका है और अमेरिका के कल्चर का उस पर प्रभाव पड़ चुका है और इस्लिये वो उसे तोक्ने की बजाये उसे अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने देना चाहती थी। या फिर वो अपने बेटे से इतना प्यार करती थी के वो उसके बेहद नज़्दीक रहना चाहती थी और इसी वजह से वो उसके साथ उसकी माँ और उसकी दोस्त की तेरह पेश आ रही थी। विशाल को दूसरी सम्भावना ज्यादा सही लागी।वज्जेह कुछ भी हो विशाल को माँ के साथ थोड़ा खुलापन अच्छा लग्ग रहा था। बलके वो खुद ज्यादा से ज्यादा समय ऊसके साथ बीताना चाहता था। 

विशाल सोने की तयारी करने लगता है। वो कपडे उतरने लगता है तोह सोच में पड़ जाता है। उसकी माँ को कोई दिक्कत नहीं थी, वैसे भी जुलाई की गर्मी में कपडे डालकर सोना मुश्किल था।
कूछ समय बाद विशाल जब्ब अपने बेड पर लेटा सोने की कोशिः कर रहा था तोह वो दिन भर क्याया क्याया घटा था, उसे याद करने लगा। अचानक से उसके दिमाग में नजाने कैसे अपनी माँ की कही वो बात गूँज उठि। 
"तु सच में बड़ा हो गयाहै...बहुत बहुत बडा......और मोटा भी....." विशाल को समज नहीं आ रहा था के उसकी माँ उसकी कद काठी की बात कर रही थी या फिर उसके लंड की जिसे उसने पूरी तरह से आकड़ा हुआ देख लिया था। वो तोह यह भी नहीं समज सकता था के उस समय चादर में उस बात की याद आते ही उसका लंड झटके क्यों मारने लगा

सूबह जब्ब अंजलि ने विशाल को उठाया तोह दिन बहुत चढ़ चुका था। कमरे में सूर्य की रौशनी फ़ैली हुयी थी। विशाल अपनी ऑंखे मल रहा था।

"तोह....तुमने मेरी बात मान ली.....रात भी बिना कपड़ों के सोये थे" विशाल तरुंत झटके से ऑंखे खोल कर देखता है,उसे डर था कहीं चादर उसके बदन से हट तो नहीं गयी थी। मगर नहीं चादर ने उसका पूरा बदन ढका हुआ था। वो अपनी माँ की तरफ देखता है। अंजलि मुस्कराती उसके पेट की और देख रही थी। जब्ब विशाल अपनी माँ की नज़रों का पीछा करता है तोह उसे एहसास होता है के चादर में से उसका लुंड तन कर सीधा खड़ा था और उसने चादर पर एक तम्बू सा बना दिया था। और अंजलि उसे घूरति मुसकरा रही थी। अचानक उसका लंड ज़ोर का झटका मारता है।विशल तरुंत दूसरी तरफ को करवट ले लेता है। अंजलि हंसने लगती है।

"मा आप जाओ में आता हुण......" विशल कहता है। उसका लंड भी उसे समज नहीं आता था के क्यों सुबह सुबह बेवजह सर उठा लेता था।

"थीक है जल्दी आना मगर.....कपडे पहन कर आना" अंजलि हँसति हुयी कहती है और जाने लगती है। तभी जैसे उसे कुछ याद आता है। 

"और हाँ मैंने तुम्हे नंगे होकर सोने की आज़ादी दी है न्यूड डे मनाने की नहि.....तुमहारा फेस्टिवल हमारे घर पर नहीं मनेगा ..." विशाल करवट लिए सर मोडकर कंधे के ऊपर से अपनी माँ को देखता है। उसके चेहरे पर ज़माने भर की हैरत थी।
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03-20-2019, 12:12 PM,
#9
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
अंजलि रूम से जा चुकी थी मगर उसकी आखरी बात ने विशाल की आँखों से नींद उड़ा दी थी. वो बेड पर उठ कर बैठा हैरान हो रहा था के आखिर उसकी माँ को मालूम कैसे चला के वो न्यूड डे के लिए रुकना चाहता था. उसने तोह उससे कोई जिकर तक्क नहीं किया था, उसे पूरा विश्वास था फिर कैसे? जब्ब विशाल को कुछ नहीं सुझा तोह वो बिस्तर से उठ जाता है. अब उसकी माँ ही बता सकती थी के उसे न्यूड डे के बारे में किसने बताया. लेकिन वो यह बात पूछ नहीं सकता था अगर पूछता तोह इसका मतलब वो स्वीकर कर लेता के वो वाक़ई में न्यूड डे के लिए रुक्ने वाला था.
विशाल निचे जाता है तोह उसकी माँ उसके सामने नाश्ता रखती है. उसने एक टीशर्ट और पायजामा डाला हुआ था. वो बिलकुल नार्मल तरीके से पेश आ रही थी. विशाल से रहा नहीं जाता और वो खुद पूछ लेता है:
"मा तुम ऊपर कमरे में क्या कह रही थी?" विशाल अन्जान बाँटे हुए पूछता है
"तुम्हेँ नहीं मालुम्........" अंजलि चाय की चुस्कियाँ लेते पूछती है.
"मुझे भला कैसे मालूम होगा............आप किसी न्यूड डे की बात कर रही थी" विशाल अपनी नज़र प्लेट पर झुकाए बोलता है.
"अगर तुम्हे मालूम ही नहीं तोह फिर रहने दो न........समझ लो में ऐसे ही पूछ रही थी, ग़लती से मेरे मुंह से निकल गया......." अंजलि बेपरवाह अपने नाश्ते में लगी केहती है.
"ओफ्फो माँ.....भगवान के लिए अब यह नाटक छोडो.....अब बता भी दो के तुम क्या कह रही थी........में अच्छी तेरह से जानता हुन तुम न्यूड डे का जिकर मेरे लिए कर रही थी........" विशाल झाला उठता है.
"तो तुम भी.......भगवान के लिए नाटक छोडो.....क्योंके तुम अच्छी तेरह से जानते हो के में न्यूड डे का जिकर क्यों कर रही थी....ज्यादा बनो मत्त........" अंजलि भी उसी की टोन में जवाब देती है.
"मतलब......मा में सच में नहीं जानता......भाला में क्यों झूठ बोलूंगा...." विशाल हकलाते हुए केहता है.
"मा हुन तुम्हारी.......मुझसे होशियारी मत दिखाओ............कया तुम न्यूड डे के लिए वहां नहीं रुक्ने वाले थे?..........में यहाँ तुम्हारे इंतज़ार में पल पल मर रही थी और तुम वहां............और झूठ मत बोलना.......मैने इंटरनेट पर सब चेक कर लिया है.......१४ जुलाई को सिर्फ न्यूड डे का फेस्टिवल होता है वहां पर........उसके सिवा और कोई फेस्टिवल नहीं है.......कोई लोकल फेस्टवल भी नही...........केहदो के में झूठ बोल रही हूँ!" अंजलि इस बार विशाल की आँखों में देखति उसे चैलेंज करती है.
विशल कुछ बोल नहीं पाता. उसके दिमाग में ख्याल तक्क नहीं आया था के उसकी माँ पढ़ी लिखी आधुनिक औरत है, और वो इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी का यूज़ करना बखूबी जानती है. नाश्ता लगभग ख़तम हो चुका था. वो ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखने लगता है जबके अंजलि किचन में बर्तन धोने लगती है. कुछसमय बाद जब्ब बाहर आती है तोह विशाल से पूछती है के उसे कुछ चाइये तोह विशाल थोड़ी और चाय पिने की इच्छा जाहिर करता है. अंजलि चाय लेकर विशाल को देती है और उसके साथ सोफ़े पर बैठ जाती है. विशल चाय का कप टेबल पर रखकर अपनी माँ के पास खिसक जाता है और उसके हाथों को अपने हाथों में थाम लेता है. 
"मा गुस्सा हो गयी क्या?" विशाल बहुत प्यार से अपनी माँ के हाथ चूमता केहता है.
"नही, मैंने कब कहा के में ग़ुस्से में हु......लकिन मुझे दुःख है के मेरा बेटा अब मुझसे दूर रहने के लिए झूठे बहाने बनाता है............" अंजलि दुःखी स्वर में केहती है.
"मा देखो ऐसा मत कहो........तुम नहीं जानती में तुम्हे हर दिन कितना मिस करता था..............." विशाल आगे को बढ़कर अंजलि को अपनी बाँहों में भर लेता है. "अब भला तुम्हे कैसे बताता...........मुझे शर्म आ रही थी..........मुजे नहीं लगता था के तुम समज पाओगी और शायद तुम गुस्सा करोगी............." विशाल अपनी माँ के कंधे पर अपना सर रगडते केहता है.
"मुझे मिस करते थे......इसीलिये एक दिन नंगे रहने के लिए मुझसे मिलने नहीं आना चाहते थे.........." अंजलि विशाल के बालों में उँगलियाँ फेरती कहती है. मतलब साफ़ था उसके दिल में कोई नाराज़गी नहीं थी.
" माँ देखो जैसे ही मुझे एहसास हुआ के तुम मेरे नहीं आने से नराज़ हो गयी हो में टिकट लेकर आ गया.........तुमहारे लिए में सब छोड़ सकता हुण..............वो तोह बस मेरे अमेरिका के दोस्त चाहते थे के हम एकसाथ सेलिब्रेट करे, इसिलिये.........." विशाल अपनी माँ की बाँह को चूम रहा था. अंजलि अब बिलकुल शांत पढ़ चुकी थी बल्कि उसके होंठो पर मुस्कराहट थी.
"दोस्तो का बहाना मत बना..........तुमहारा अपना मन कर रहा होगा उन गोरों के साथ नंगे होकर.........मलूम नहीं काया काया करते हैं वो लोग........" 
"उन्ह: माँ ऐसा वैसा कुछ नहीं होता........बस उस दिन कपड़ों को तन से दूर रखा जाता है और कुछ नाहि.............तुमहे काया लगता है में कोई
ऐसा वैसा
काम करूँगा" विशाल अपनी बाहे अंजलि की पीठ पर निचे की और लेजाकर उसे अपनी और खींचता है और अपने सीने से चिपटा लेता है. अंजलि के मोठे मुम्मे उसकी छाती पर बहुत ही प्यारा, बहुत ही कोमल सा एहसास दिला रहे द. अंजलि की जांघे बेटे की जांघो से रगड़ खा रही थी मगर उसे कोई एतराज़ नहीं था. दोनों माँ-बेटा तोह बस ममतामयी प्यार में डूबे हुए थे
"हूँह्.......फिर क्या प्रॉब्लम है.........तु अपना फेस्टिवल यहाँ भी मना सकता है......" अंजलि बेते के चेहरे को सेहलती केहती है.
"क्या मतलब माँ?........" विशाल हैरान होता पूछता है.
"मतलब तुम रात में नंगे सोते हो अगर तुम्हे दिन में भी कपडे नहीं पेहनने तोह मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है.............." 
"मा??????.........तुम बदल गयी हो............पहले से कितनी बदल गयी हो......" विशाल मुस्कराता अपनी माँ का गाल चूम लेता है. 
"और तुम्हे अपनी बदलि हुयी माँ कैसी लगती है......." अंजलि मुस्कराती बेटे की आँखों में देख रही थी.
"उम्म्म्म......अच्छी.......बहुत अच्छी मा........"
"असल में तुम्हारे आने से पहले में सोचती थी.........के इतने साल अमेरिका के खुले वातावरण में रहने का तुम पर कुछ न कुछ असर जरूर होगा.......थोड़ी बहुत तुमारी सोच बदलेगी.......तुमहारे पापा भी एहि कहते थे.........और में नहीं चाहती थी के तुम्हे हमारे घर में घुटन महसूस हो.........में तोह बस एहि चाहती हुन के तुम खुश रहो..........में नहीं चाहति के तुम्हे हर बात पर टोकती फिरू और तुम यहाँ से भाग जाओ......"
"जो कभी नहीं हो सकता के में आप लोगों से दूर भाग जायूँ और तुम्हे लगता है के में अमेरिका में रहकर बदल गया हूँ?" 
"नही मेरे लाल तुम आज भी बिलकुल वैसे ही हो जैसे चार साल पहले थे.......बस एक फरक है. पहले कपडे पेहन कर सोते थे और अब नंगे.........." अंजलि हंस पड़ती है. विशाल भी हंस पढता है. वो अपनी माँ की पीठ सेहला रहा था. अंजलि कुछ पलों की चुप्पी के बाद फिर से उसे केहती है " अच्चा यह तोह बता तुझे मुझ में अच्छा क्या लगता है....मेरा मतलब बदलाव से है?"

उम्मम्मम्मम्मम्ह........अब आप एक माँ ही नहीं अब आप मेरी दोस्त भी हो. एक बहुत ही अछि और भरोसेमन्द दोस्त और हाँ बहुत ही सुन्दर भी, बला की खूबसूरत जिसके साथ में सब कुछ शेयर कर सकता हु......." विशाल अपनी नाक अपनी माँ के नग्न कंधे पर रगड़ रहा था. कैसी मुलायम स्किन थी. कैसे उसके ठोस मम्मे उसकी छाती को चीर रहे थे.

"चल हट....मा से दिल्लगी करता है. मुझे अच्छी तरह से मालूम है में कितनी सुन्दर और कितनी खूबसूरत हु......" अंजलि मुस्कराती है. बेटे के लफ़ज़ उसके कानो में शहद घोल गए थे.

"मा हीरे की कीमत सिर्फ जौहरी जान सकता है....." विशाल चेहरा उठाकर अंजलि का गाल चूम लेता है. उसे अपनी माँ पर इतना प्यार आ रहा था की उसका दिल कर रहा था के वो उसके पूरे चेहरे को चुमे, उसके पूरे जिस्म को सहलाएँ.
"उनननह.....अच्छा जी. ऐसे ही लड़कियों को पटाता होगा झूठी तारीफ करके......" अंजलि दिल से बेटे की तारीफ और उसके मीठे चुम्बन से बहुत खुश थी. "लेकिन वो सब छोड़ अभी अभी तूने कहा की में तुम्हारी भरोसेमन्द दोस्त हु........इसका मतलब है के तुझे मुझपर भरोसा है और भरोसेमंद दोस्त होने के नाते तू मुझसे कोई बात नहीं छुपायेगा........मुझसे झूठ नहीं बोलेगा........." अंजलि बेटे की आँखों में देखति जैसे उसे उकसाती है.
"नही मा.......झुठ नहीं बोलूंगा.....छिपाऊँगा भी नही.......वैईसे भी मेरे पास छुपाने लायक ऐसा कुछ नहीं है........" विशाल एक दो पलों की ख़ामोशी के बाद जवाब देता है.
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03-20-2019, 12:12 PM,
#10
RE: Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई
"सोच लो में कुछ भी पूछ सकती हुण......." अंजलि बेटे की आँखों में देखति जैसे उसे चैलेंज करती है.
"पुच लो माँ, अब जब हम दोस्त बन ही गए हैं तोह फिर दोस्तों के बिच कैसा परदा" विशाल मुस्कराता अंजलि को खुली छूट दे देता है.
"अच्छा तो सच सच बताओ के यह न्यूड डे होता क्या है और तुम इसे आखिर सेलिब्रेट कैसे करते हो........" अंजलि बेटे की आँखो में देखते कहती है. विशाल अपनी माँ की आँखों में जिग्यासा साफ़ साफ़ देख सकता था.
"मुहे उम्मीद थी तुम एहि पुछोगी......" विशाल अपनी माँ को खीँच कर और भी अपने सीने से भींच लेता है. वो अपने सीने पर अंजलि के भारी मम्मे के साथ उसके तीखे नुकिले निप्पलों की चुभन को भी बखूबी महसूस कर सकता था. "मा इसको सेलिब्रेट करने का ढंग हर किसी का अपना अपना होता है, यह ज्यादा डिपेंड करता है के आप किसके साथ सेलिब्रेट करते है. अब देखो में अपनी बात करूँ तोह हम दोस्त लोग सुबह से शाम तक्क मौज मस्ती करते थे, पार्टी करते थे. खाना पीना, डांस, लाउड मुसिक, शोर शराबा........बस समाज लो नंगे होकर हल्ला करते थे............." 

"ओहहहहहः.........." अंजलि एक पल के लिए सोच में पड जाती है. "तो और लोगों के बारे में बताओ.......और लोग कैसे सेलिब्रेट करते है......." अंजलि अभी भी बहुत उत्सुक थी. 

"उम्म जैसे मैंने केहा माँ डिपेंड करता है के आप किन लोगों के साथ सेलिब्रेट करते है....... ऐसे कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ कपड़ों से दूर रहते है.....कुछ लोग बड़ी बड़ी न्यूड पार्टीज भी मनाते है.........कुछ लोग ग्रुप्स में होकर बिच पर जाते है..........और फैमिलीज़ में लोग......." 

"क्या फैमिलीज़ में......क्या लोग अपनी फॅमिली के साथ भी न्यूड डे मनाते है......" अंजलि एक दमसे हैरत से चिल्ला पड़ती है.

"हा माँ........क्यों नहि........मगर सभी नही.........ऐसे भी न्यूड डे हर कोई नहीं मनाता.........वहा लोगों के बिच एक खुलापन है.......उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है......" 

"यकीन नहीं होता.......भला यह भी कोई बात हुयी......कैसे एक माँ अपने बेटे के सामने एक बेटी अपने बाप के सामने या फिर एक बहिन अपने भाई के सामने नंगी हो सकती है.......यह तोह बेशरमी की हद्द है.........." अंजलि को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

"देखो माँ में पहले ही तुम्हे कह चुका हु के हर कोई न्यूड डे नहीं मनाता.......और माँ उनके कल्चर में नगन्ता कोई बड़ी बात नहीं है......मान लो नगन्ता उनके कल्चर का हिस्सा है इस्लिये यह बात उनके लिए इतने ज्यादा मायने नहीं रखती ..." विशाल अपनी माँ को समजाता है.

"शी.....यह भी कोई कल्चर हुआ........कैसे बेहूदा तौर तरीके हैं उन लोगों के......." अंजलि किसी सोच में गुम कह उठती है.

"मा यह तोह अच्छी बात न हुयी........इस तरह उन लोगों के कल्चर को बेहूदा कहना. ........जब हम लोग जानवरों की भी पूजा करते है........पेड़ पोधों तक्क की और इस कारन जब्ब वो लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं तो हमें कैसा लगता है!...........मा हमारी नज़र में हम जो करते हैं वो ठीक है क्योंके हमारी मान्यता उसे जायज ठहरति है......ऐसे ही उनकी मान्यता है....उनके जीने का रंग ढंग हैं........बस बात एहि है के वो हमारी मान्यतायों के लिए हमारा मजाक उड़ाते हैं और हम उनका........." 

"बस बस्स.........उनकी ज्यादा तरफ़दारी करने की जरूरत नहीं है......मुझे क्या मालूम था तुझे मेरी छोटी सी बात का इतना गुस्सा लगेगा......." अंजलि झूठ मुठ की नाराज़गी जाहिर करती है जबके वो खुद जानती थी के विशाल गुस्सा नहीं है.
"यह माँ में गुस्सा नहीं हु......में तोह बस तुम्हे बताने की कोशिश कर रहा था.......उनके हिसाब से.......के यह कोई गलत बात नहीं है......" विशाल अपनी माँ के गाल को चूमता हुआ बोला.
"ठीक है ठीक है.......लकिन इसमें ऐसा क्या है जो तुम लोग भी इसे मनाते हो......उनकी बात छोड़हो.........तुम्हरी बातों से लगता है के तुम भी खूब एन्जॉय करते होगे........अखिर इसमें ऐसा कोनसा मज़ा है जो तुम्हे भी यह इतना पसंद है.........."
"मा बस एक फीलिंग है, एक अलग ही किसम का एहसास होता है जिस्म से कपडे जुदा करने का......कुदरत को खुद से इतना करीब महसूस करने का.......एक बहुत ही रोमांचक सा एहसास होता है माँ.......ऐसे लगता है जैसे आप सभी बन्धनों से आज़ाद हो गए हों...........इसे लफ़्ज़ों में बयां करना मुश्किल है.........इसे तोह बस महसूस किया जा सकता है......." विशाल की आँखों से मालूम चलता था के न्यूड डे उसे कितना पसंद था.
"बास बस्स......रहने दे......और व्याख्या की जरूरत नहि.......मेरी समज में अच्छे से आ गया है......." अंजलि हँसति हुयी कहती है तोह विशाल भी हंस पढता है.
"अच्छा एक बात तो बता........" अचानक से अंजलि बहुत ही शरारती सी मुस्कान के साथ विशाल की आँखों में देखति है. "तुम्हारे इस महान कार्यक्रम में लड़कियां भी हिस्सा लेती थी क्या........" विशाल अपनी माँ के सवाल पर बुरी तरह शर्मा उठता है. उससे जवाब देते नहीं बन पा रहा था. वो धीरे से अपना सर हा में हिला देता है और स्वीकार कर लेता है.
"वॉव............" अंजलि लम्बे सुर में कहती है. "अच्छा अगर लड़कियां भी हिस्सा लेती थी तोह फिर.......फिर तुम्हारे इस रँगा रंग नंगे कार्यक्रम का समापन कैसे होता था...........और देखो झूठ मत बोलना, तुमने वादा किया है........" अंजलि उसी शरारती मुस्कान के साथ बेटे को याद दिलाती है.
"मा.....तुम......प्लीज् यह मत पूछो...........झुठ तुमने बोलने से मना किया है.......और सच में बोल नहीं सकता........." विशाल नज़रें चुराता कहता है. 
"हुँऊँणह्ह्ह्हह्ह्.......में भी कैसी बुद्धू हु....... ...तोः यह असली वजह थी के तुम न्यूड डे को क्यों इतना पसंद करते हो....के मुझे मिलने के लिए भी नहीं आना चाहते थे......और में भी कितनी बुद्धू हु........केसा सवाल पूछ बैठि.........जब जवान लड़के लड़कियां नंगे होकर क्या करेंगे भला यह भी कोई पुछने की बात है........." अंजलि की हँसी रोके नहीं रुक रही थी. विशाल के गाल शर्मिंदगी से लाल हो गए थे.

आखिरकार अंजलि बेटे का गाल चूमती है और धीरे से मुस्कराते हुए उससे जुदा होती है. उस गर्माहट भरे अलिंगन से जुदा होने पर दोनों माँ बेटे को अच्चा महसूस नहीं होता.

"चल मुझे बहुत से काम करने है......सुबह का घर का सारा काम पडा है.......दोपहर का खाना भी बनाना है......बातों बातों में समय का पता ही नहीं चला.........तूझे आज कहीं जाना तोह नहीं है.........." अंजलि अपने कपडे ठीक करते हुए कहती है. विशाल अपनी नज़र तरुंत फेर लेता है. अंजलि के भरी मम्मे उसकी टी-शर्ट के अंदर हिचकोले खा रहे थे. 

"अपने दोस्तों से ही मिलने जाना है माँ. कल सभी से मिल नहीं पाया था" विशाल अपनी नज़र बलपूर्वक टीवी की तरफ मोड़ कर कहता है.

"ठीक है बेटा.........में थोड़ा बहुत काम निपटा दुं, उसके बाद लंच की तय्यारी करती हु. तुम लंच के बाद अपने दोस्तों से मिलने चले जाना मगर कल की तरह रात को देर नहीं करना. तुम्हारे पीता रात में गुस्सा कर रहे थे."

"हु......ठीक है माँ, आज जल्दी आने की कोशिश करूँगा" 

दोनो माँ बेटा अपने अपने काम में बिजी हो जाते है. विशल ऊपर अपने कमरे में जाकर अपने लैपटॉप पर कुछ इ-मेल्स भेजने में मशरूफ़ हो जाता है जबकि अंजलि घरेलु कामो में. बेटे के पास उठने को उसका दिल नहीं कर रहा था मगर घर का सारा काम पडा था. उसकी मजबूरी थी इस्लिये उसे उठना पढ़ा नहीं तोह बेटे का साथ, उससे बातें करना, उसका वो गर्माहट भरा अलिंगन, माँ के प्यार मे डूबे उसके चुम्बन, सभ कुछ कितना प्यारा कितना आनन्दमयी था. लेकिन वो दिल ही दिल में इस बात से भी डरती थी के कहीं वो अपने बेटे को बोर न करदे.

विशाल भी अपने कमरे में जाकर लैपटॉप के सामने बैठा अपनी माँ के साथ बिताये अपने समय के बारे में ही सोच रहा था. कितना सुकुन, कितना आनंद था माँ के अलिंगन में. कैसे वो उसकी और प्यार भरी नज़रों से देखति बार बार मुसकरा पड़ती थी. सभी कुछ कितना रोमांचक महसूस हो रहा था. विशाल आज खुद को अपनी माँ के इतने इतने करीब महसूस कर रहा था जितना उसने आज तक कभी नहीं किया था. उनके बिच एक नया नाता जुड़ गया था और विशाल का दिल कर रहा था के वो अपना सारा समय अपनी अपनी माँ से यूँ ही लीपटे हुए उससे बातें करते हुए बिताए.लंच के बाद जल्द ही विशाल घर से निकल गया. अपने पुराने दोस्तों को मिलकर उनके साथ मस्ती करने में एक अलग ही आनंद था. मगर नाजाने क्यों उसे कुछ कमी महसूस हो रही थी. जैसे मज़ा उसे पिछले दिन अपने दोस्तों के साथ समय बिताने में आया था वैसा मज़ा आज नहीं था. आज उसका ध्यान बार बार घर की और जा रहा था. सही अर्थों में उसका ध्यान घर की और नहीं बल्कि अपनी माँ की और जा रहा था. शाम होते होते वो कुछ बेचैन सा हो उठा और अपने दोस्तों से विदा लेकर घर की और चल पढ़ा. उसके दोस्त उसके इस तरह इतनी जल्दी चले जाने से खुश नहीं थे और उससे कुछ देर रुक्ने के लिए रिक्वेस्ट कर रहे थे मगर विशाल के लिए रुकना मुश्किल था. जब्ब वो घर पहुंचा तो अभी उसके पिताजी काम से लौटे ही थे और अंजलि किचन में खाना पका रही थी.

विशाल जैसे ही किचन में गया उसकी माँ उसे इतनी जल्दी लौटा देख थोड़ी हैरान हो गयी मगर उसका चेहरा ख़ुशी से खील था. 

"क्या हुआ? आज इतनी जल्दी कैसे लौट आये? मुझे लगा था कल्ल की तरह लेट हो जाओगे" अंजलि मुस्कराती हुयी बेटे का अभिनंदन करती है. विशाल आगे बढ़कर अपनी माँ को अपने अलिंगन में भर लेता है. 

"क्या करूँ माँ तुमारे बिना दिल ही नहीं लग रहा था.........इसीलिये चला आया." विशाल मुस्कराता अपनी माँ से कहता है. अंजलि बेटे के चेहरे को प्यार भरी नज़रों से देखति है. वो अपने जिस्म को अपने बेटे की बाँहों में ढीला छोड़ देती है. विशल अपनी बहें अपनी माँ की कमर पर थोड़ी सी कस्स कर उसे अपनी तरफ खेंचता है तोह अंजलि के मम्मे उसके सीने पर दस्तक देणे लगते है. अंजलि कुछ कहने के लिए मुंह खोलती है के तभी ड्राइंग रूम में कदमो की आहट सुनायी देती है. विशाल घबरा कर तूरुंत अपनी माँ को अपने अलिंगन से आज़ाद कर देता है और किचन में एक कार्नर में रखी कुरसी पर बैठ जाता है. अंजलि उसके इस तरह घबरा उठने पर हंस पड़ती है. विशाल शर्मिंदा हो जाता है. तभी कमरे में विशाल के पिता का आगमन होता है. वो अंजलि से इस तेरह हंसने की वजह पूछता है तोह अंजलि कहती है के विशाल उसे एक बहुत ही मज़ेदार जोक सुना रहा था. विशाल और शर्मिंदा हो जाता है.
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