Kamukta Story कांटों का उपहार
06-09-2020, 01:26 PM,
#1
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कांटों का उपहार

लेखक-रानू का बहुचर्चित उपन्यास




रामगढ़ का इलाक़ा. दूर दूर तक फैला हुआ. सुबह की किरणें चप्पे चप्पे पर अपना जाल बुन चुकी थी. बच्चो ने धूप और मिट्टी से खेलना आरंभ कर दिया था.
वातावरण स्वच्छ था। नीले गगन की चादर पर पक्षी उन्मुक्त उड़ रहे थे। किसान अपने हल संभाले बैलों की जोड़ी सहित खेतों पर निकल चुके थे। ऊबड़- खाबड़ पगडंडियां, टेढ़े- मेढ़े रास्ते, छोटे-बड़े झोपड़े, खपरैल के मकान, ईंट और पत्थर के मकान।

और राधा, राजा सूरजभान सिंग के बगल में उनके राजमहल की सबसे उँची मज़िल पर एक किनारे खड़ी इस कस्बे का नक़्शा आज पहली बार देख रही थी जिसकी वह एक साधारण सी गोरी थी. पलकों पर आँसू झिलमिला रहे थे. जिसके चारो और फैला काजल उसके जीवन के समान अंधकारमय बन चुका था. माथे पर सिलवटें थी. माथे की बिंदिया उजड़ी हुई, लटे बिखरी, होठ सूखे, ब्लाउस के बटन टूटे हुए, कपड़े केयी जगह से फटे हुए. उपर से देखने पर वह उसी नदी की तरह गंभीर और शांत थी जिसकी गोद में अनगिनत अरमानों की लाशें दम तोड़ कर चुप चाप बैठ जाती है.

"यह देख रही हो राधा?" सूरजभान ने हाथ के इशारे से पूरब दिशा की ओर इशारे करते हुए कहा - "यह सारा इलाक़ा जहाँ तक तुम्हारी दृष्टि जा रही है सब हमारा है. मेरा है." उन्होने शब्द 'मेरा' पर विशेष ज़ोर दिया. - "मैं राजा हूँ और यहाँ के लोग मेरी प्रजा. यह सब मैं तुम्हे दे दूँगा. तुम्हारे कदमो में बिच्छा दूँगा"

राधा कुच्छ नही बोली केवल सामने देखती रही, जहाँ कुच्छ ही दूरी पर एक विशाल पेड़ था. इसकी जड़ में सेमेंट का एक चबूतरा बना हुआ था जिसकी सतह पर खून से अनगिनत बेगुनाहों की कहानी लिखी हुई थी. उसने अपनी आँखें बंद कर ली और होठ भिच लिए. उसकी आँखों में एक तश्वीर घूम गयी. उसकी बड़ी बेहन कम्मो की. कम्मो तीन वर्ष पहले सूरजभान के पिता विजयभान सिंग की वासना का शिकार हो गयी थी. और फिर किसी को अपना मूह ना दिखा सकने के कारण उसने एक रात इसी पेड़ की टहनी से लटक कर फाँसी लगा ली थी. सुबह जब उसके बापू ने इंसाफ़ माँगते हुए दुहाई दी तो विजयभान ने उसी पर झूठा इल्ज़ाम लगा कर उसे मौत की नींद सुला दिया था. इस अंजाम को देख कर गाओं वालों के दिल में विजयभान सिंग का डर समा गया था. ग़रीब गाओं वाले उसके ज़ुल्म सहने पर विवश थे. रात दिन चुप चाप एक ही दुआ माँगा करते थे कि ईश्वर उसे इस धरती से उठा ले. और ऐसा हुआ भी. ईश्वर ने गाओं वालों की दुआओं को सुन लिया. वह दो माह पहले ऐसे बीमार हुए कि फिर उठ ना सके. उनके मरने पर गाओं वाले बहुत खुश हुए. पर यह खुशी बहुत थोड़े समय के लिए थी. उसके स्थान पर उसका बेटा सूरजभान सिंग आ बैठा. सूरजभान सिंग बचपन से लंडन में रहे थे. वह भी अपने बाप दादाओं की तरह विलासिता में किसी भी प्रकार से कम नही थे.

एक रोज़ सूरजभान मंत्री प्रताप सिंग के साथ किसी काम से शहर जा रहे थे. तभी उनकी नज़र राधा पर पड़ी. राधा भोला के साथ थी. भोला उसके बचपन का साथी था. बचपन में ही उनके माता पिता ने उनकी मँगनी कर दी थी. राधा सूरजभान सिंग की गाड़ी की आवाज़ सुन कर भोला के साथ खेत की मेड़ की आड़ में छिप गयी. परंतु फिर भी सूरजभान सिंग की नज़र से खुद को नही बचा पाई. पहली ही नज़र में उसकी कयामत ढाती जवानी सूरजभान सिंग के दिल में उतर गयी. सूरजभान सिंग उस समय जल्दी में थे. प्रताप सिंग से उसके बारे में थोड़ी पुछ-ताछ करके अपने रास्ते बढ़ गये. चौथे दिन जब वह शहर से लौटे तो उसी दिन राधा की भोला के साथ शादी थी. उन्होने उसी रात अपने डाकू भेज कर राधा को मंडप से उठवा लिया और बल पूर्वक उसके शरीर को भोगा.

राधा ने सूरजभान सिंग को दिल से बद-दुआ दी. उसका बस चलता तो वह उसका मूह नोच लेती. लेकिन ग़रीब लड़की थी-केवल तड़प कर रह गयी.

सूरजभान सिंग के दिल को चोट पहुँची. उन्होने राधा की बाँह थामी और उसे दूसरी ओर ले गये. पश्चिम दिशा की ओर...! काफ़ी दूर कुच्छ एक ताड़ के पेड़ों पर गिद्ध बैठे हुए दिखाए पड़ रहे थे. उन्होने फिर कहा - "वह उन ताड़ के पेड़ों से भी बहुत दूर, जहाँ तुम्हारी नज़र भी नही पहुँच सकती. सब हमारा है. मैं यह सब कुच्छ तुम्हे दे दूँगा. तुम्हे इस इलाक़े की रानी बना दूँगा. यहाँ के निवासी तुम्हारी प्रजा होंगे. लेकिन एक शर्त...मुझे क्षमा कर दो. मेरे प्रति अपने दिल में जगह बना लो. अपनी उदासी भूल कर एक बार मुस्कुरा दो. मुझे इस संसार में और कुच्छ भी नही चाहिए. तुम खुद खुद जानती हो मुझे संसार में किसी चीज़ की कमी नही रही है. मैने जो कुच्छ भी चाहा वह एक इशारे पर मेरे कदमों में आ गिरा. परंतु कल रात तुम्हारे शरीर को अपनाने के बाद ही ना जाने क्यों मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानों मैने तुम पर बहुत ज़ुल्म किया है. तुम्हारी इन काली आँखों में जाने कैसा जादू है की इनके प्रतिबिंब को देख कर मेरे अंदर का मानव जाग उठा है. मेरे अंदर की इंसानियत मुझे धिक्कार रही है. राधा...क्या तुम मुझे क्षमा करके मुझे एक नया जीवन जीने का मौक़ा नही दोगि?"
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06-09-2020, 01:26 PM,
#2
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
"राजा साहेब...!" राधा ने भीगे स्वर में तड़प कर कहा. - "मैं आपको कभी क्षमा नही करूँगी. मरते दम तक नही. आप इंसान नही शैतान हैं. आपने मुझे शादी के मंडप से उठावाते हुए यह नही सोचा था कि मेरा बूढ़ा बाबा मर जाएगा. अनगिनत लोगों का दिल टूट जाएगा. राजा साहेब भगवान कुच्छ नही देखता है. सब्र करते हुए सबकी सुनता है. देख लीजिएगा दौलत का यह घमंड एक दिन चूर चूर हो जाएगा. आप कहीं के नही रहेंगे. मेरी सिसकियाँ आपको खा जाएँगी. मेरी आहें इस खूबसूरत हवेली को खंडहर बना कर रख देंगी."

"राधा...!" सूरजभान ने सब्र से काम लिया. - "कल किसने देखा है? लेकिन फिर भी यदि मैं अपने पापों का पश्चाताप कर लूँ तो क्या तब भी तुम मुझे क्षमा नही करोगी?"

"कभी नही." राधा अटल मन से बोली - " बल्कि मैं चाहूँगी कि भगवान तुम्हे ऐसी जगह मारे जहाँ तुम पानी की एक बूँद को भी तरस जाओ. तुम्हे चिता भी नसीब ना हो. तुम्हारे शरीर को गिद्ध और कोव्वे नोच-नोच कर खा जाएँ."

"नही राधा नही. मुझसे इतनी नफ़रत ना करो कि मेरा जीना मुश्किल हो जाए. तुम्हे मुझे क्षमा करना ही होगा. मैं अपने पापों का ऐसा ही प्रायश्चित करूँगा."

राधा कुच्छ कहती उससे पहले ही मंत्री प्रताप सिंग की आवाज़ सूरजभान सिंग के कानों से टकराई. - "महाराज, गाओं से फरियादी आए हैं."

"तुम इन्हे रंगमहल पहुँचा दो. हम अभी आते हैं." सूरजभान सिंग ने अपनी स्थिति संभाल कर राधा की तरफ इशारा किया.

मंत्री प्रताप सिंग राधा को रंगमहल में छोड़ कर चला गया. राधा आकर पलंग पर बैठ गयी. पैरों को उपर समेटकर उसने घुटने के चारों और अपनी बाहें लपेट ली. और गर्दन झुका कर एक गाल घुटने पर रख लिया. उसके मानस-पटल भोला की ताश्वीर घूम गयी. उसनकी पलकों से आँसू छलक पड़े - " भोला...!" उसके होठों से एक आ टॅपकी. - "तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया? क्यों नही अपनी जान की बाज़ी लगा कर मुझे बचा लिया?" वह सिसक पड़ी.

सहसा उसने कदमों की चाप सुनी तो अपने विचारों से जागी. उसने देखा सूरजभान सिंग पधार रहे हैं. शाही लिबास में लंबा चौड़ा शरीर बहुत खिल रहा था. वह राधा के समीप ही आकर खड़े हो गये. राधा ने घृणा के कारण अपनी पलकें दूसरी ओर फेर ली.

"गाओं वाले अपनी फरियाद लेकर आए थे." उन्होने कहा. - "कल रात कुच्छ लुटेरों ने उनके झोपड़ो में आग लगा दी है."

राधा उसी प्रकार बैठी रही. घृणा से मन ही मन उसे कोस्ति रही. गाओं वाले लूटेरे को जान कर भी अंजान थे. फरियाद भी लाए तो लूटेरे के पास.

"मैने उन सभी को ही मूह माँगी कीमत दे दी है. इसलिए कि इन लूटेरों से मैं उनकी हिफ़ाज़त नही कर सका. मैने उन्हे समझा दिया है कि अब यहाँ कोई लूटेरा नही आएगा. मैने भोला की माँग भी पूरी कर दी है."

राधा की भीगी पलकें उपर को उठी. उसने आश्चर्य से सूरजभान को देखा.

"हां...!" वह बोले - "उसने तुम्हारी कीमत पंद्रह हज़ार लगाई. कहने लगा डाकुओं ने राधा को उठा लिया. मंडप में आग लगा दी. दहेज को आग में फेंक दिया. पाँच हज़ार रुपये साथ ले गये. मैं जानता हूँ, मेरे लोगों को ऐसा साहस कभी नही होगा. रुपये तो वह जितना चाहें मुझसे ले सकते हैं. परंतु मैं चुप ही रहा. तुमको भूलने के लिए उसने पंद्रह हज़ार रुपये की माँग की जो मैने तुरंत पूरी कर दी."

"पंद्रह हज़ार...!" राधा के होंठों से अचानक ही निकल गया. राधा को भोला पर बहुत क्रोध आया. जीवन भर उससे प्यार करने का दावा करने वाला केवल पंद्रह हज़ार में ही फिसल गया. उसके प्यार के सहारे ही तो उसने सूरजभान की ईट से ईट बजा देने की ठानी थी. परंतु यह सब क्या हो गया? भोला इतनी जल्दी बदल गया. यदि भोला इतनी जल्दी बदल गया तो भला दूसरे लोग उसका साथ क्यों देने लगे. फिर भी उसने सूरजभान की बातों के उत्तर में कहा - यह झूठ है. भोला कभी भी मेरी कीमत नही लगा सकता."

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06-09-2020, 01:27 PM,
#3
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार


"यह सच है राधा." उन्होने गंभीर होकर कहा - "यह बात तुम उसी से पुछ लेना. मैने उसका दिल टटोला तो उसने स्पस्ट शब्दों में कह दिया कि अब वह तुम्हे किसी भी अवश्था में स्वीकार नही करेगा."

राधा का दिल टूट गया. वह सिर झुकाए सिसक पड़ी.

"राधा, मुझे क्षमा कर दो. तुम चाहो तो मैं तुम्हे अपनी पत्नी बनाने को तैयार हूँ."

"पत्नी...!" राधा ने त्रिशकृत भाव से कहा - "भारतीय नारी एक ही बार पत्नी बनती है. और वह मैं बन चुकी हूँ. भोला की पत्नी. मेरी सगाई उसके साथ बचपन में ही हो चुकी है."

"लेकिन अब वह तुम्हे नही अपनाएगा."

"मैं खुद भी अपना सब कुच्छ लूट जाने के बाद उसके पास नही जाना चाहती. खास कर ऐसी अवश्था में जबकि उसने मेरे दिल को सख़्त ठेस पहुँचाई है. लेकिन मैं मरना भी नही चाहती. मैं अपने खानदान की आखरी निशानी हूँ. मैं ज़िंदा रहूंगी और ज़िंदा रह कर यह देखना चाहती हूँ कि ऐसे आदमी का क्या हश्र होता है जिसने अपने आनंद के लिए मेरा खानदान लूट लिया."

"राधा...!" सूरजभान की पलकें भीग गयी. राधा की बातें बरच्छियों की तरह उनके दिल पर चुभने लगी. वह बोले - "क्या इस संसार में मेरे लिए कोई ऐसा प्रय्श्चित नही जिसके कारण तुम मुझे प्यार ना सही क्षमा ही कर सको?"

"हरगिज़ नही."

"मेरा विश्वास करो राधा. मैं तुम्हे चाहता हूँ, तुमसे प्यार करता हूँ. तुम्हारी खुशी के लिए अपना सब कुच्छ भेट चढ़ा देना चाहता हूँ. अपना राज्य, राजमहल सब कुच्छ त्याग दूँगा. चाहें तो मुझे आज़मा लो, मेरी परीक्षा ले लो. मैं कभी भी तुम्हे निराश नही करूँगा."

"यदि ऐसी बात है तो मुझे आज़ाद कर दीजिए. मैं अपने बाबा के पास जाना चाहती हूँ." राधा ने यहाँ से बच निकलने का रास्ता ढूँढा.

सूरजभान के दिल पर निराशा ने दूसरी बात की. - "ठीक है राधा. तुम अपने घर जा सकती हो. अब मैं तुम पर कोई दबाव नही डालूँगा."

सूरजभन ने ताली बजाई. तत्काल एक आदमी भीतर आया.

"इन्हे सुरखित महल से बाहर छोड़ आओ." उन्होने अपने आदमी को आदेश दिया.

राधा गुप्त रास्तों से होती हुई महल से बाहर निकल गयी.
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06-09-2020, 01:27 PM,
#4
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
Ramgarah ka ilaaqa. Door door tak faila hua. Subah ki kirne chappe chappe par apna jaal bun chuki thi. Bachon ne dhoop aur mitti se khelna aarambh kar diya tha.

Aur radha, raja surajbhan singh ke bagal mein unke rajmahal ke sabse unchi mazil par ek kinare khadi is kasbe ka naqsha aaj pehli baar dekh rahi thi jiski wah ek saadharan si gori thi. Palkon par aansu jhilmila rahe the. jiske chaaro aur faila kaajal uske jeevan ke samaan andhkaarmay ban chuka tha. maathe par silwaten thi. Maathe ki bindiya ujdi hui, Laten bikhri, hoth sukhe, blouse ke buttun tute hue, kapde kayi jagah se fate hue. upar se dekhne par wah usi nadi ki tarah gambhir aur shant thi jiski god mein anginat armaanon ki laashen dam tod kar chup chaap baith jaati hai.

"yah dekh rahi ho radha?" surajbhan ne hath ke ishare se purab disha ki aur ishare karte hue kaha - "yah sara ilaaqa jahan tak tumhari drushti ja rahi hai sab hamara hai. Mera hai." unhone shabd 'mera' par vishesh zor diya. - "main raja hoon aur yahan ke log meri praja. yah sab main tumhe de dunga. Tumhare kadmo mein bichha dunga"

Radha kuchh nahi boli keval saamne dekhti rahi, jahan kuchh hi doori par ek vishaal ped tha. Iski jad mein cement ka ek chabutra bana hua tha jiski satah par khoon se anginat begunahon ki kahani likhi hui thi. Usne apni aankhen band kar lee aur hoth bhich liye. Uski aankhon mein ek tashveer ghum gayi. Uski badi behan kammo ki. Kammo teen varsh pehle surajbhan ke peeta vijaybhan singh ki vaasna ka shikaar ho gayi thi. Aur phir kisi ko apna muh na dikha sakne ke kaaran usne ek raat isi ped ki tehni se latak kar faansi laga li thi. subah jab uske bapu ne insaaf maangte hue duhai di to vijaybhan ne usi par jhootha ilzaam laga kar use maut ke neend sula diya tha. Is anjaam ko dekh kar gaon walon ke dil mein vijaybhan singh ka darr sama gaya tha. garib gaon wale uske zulm sehne par vivash the. Raat din chup chaap ek hi dua maanga karte the ki ishwar use is dharti se utha le. Aur aisa hua bhi. Ishwar ne gaon walon ki duaon ko sun liya. wah do maah pehle aise bimaar hue ki phir uth na sake. Unke marne par gaon wale bahut khush hue. Par yah khushi bahut thode samay ke liye thi. uske sthan par uska beta surajbhan singh aa baitha. Surajbhan singh bachpan se london mein rahe the. wah bhi apne baap dadaon ki tarah vilasita mein kisi bhi prakaar se kam nahi the.

Ek roz surajbhan mantri pratap singh ke sath kisi kaam se shahar ja rahe the. Tabhi unki nazar radha par padi. radha bhola ke sath thi. Bhola uske bachpan ka sathi tha. Bachpan mein hi unke maata peeta ne unki mangni kar di thi. Radha surajbhan singh ki gaadi ki awaaz sun kar bhola ke sath khet ke medh ki aad mein chheep gayi. Parantu phir bhi surajbhan singh ki nazar se khud ko nahi bacha paayi. pehli hi nazar mein uski kayamat dhaati jawani surajbhan singh ke dil mein utar gayi. Surajbhan singh us samay jaldi mein the. Pratap singh se uske baare mein thodi puchh-taachh karke apne raaste badh gaye. Chauthe din jab wah shahar se laute to usi din radha ki bhola ke sath shadi thi. unhone usi raat apne daaku bhej kar radha ko mandap se uthwa liya aur bal purvak uske sharir ko bhoga.

Radha ne surajbhan singh ko dil se bad-dua di. Uska bas chalta to wah uska muh noch leti. Lekin garib ladki thi-keval tadap kar reh gayi.

Surajbhan singh ke dil ko chot pahunchi. Unhone radha ki baanh thaami aur use dusri aur le gaye. Pashchim diha ki aur...! Kaafi door kuchh ek taad ke pedon par giddh baithe hue dikhaye pad rahe the. Unhone phir kaha - "wah un taad ke pedon se bhi bahut door, jahan tumhari nazar bhi nahi pahunch sakti. Sab hamara hai. Main yah sab kuchh tumhe de dunga. Tumhe is ilaaqe ki rani bana dunga. Yahan ke nivasi tumhari praja honge. Lekin ek shart...mujhe kshama kar do. Mere prati apne dil mein jagah bana lo. Apni udasi bhul kar ek baar muskura do. Mujhe is sansar mein aur kuchh bhi nahi chahiye. Tum khud khud janti ho mujhe sansaar mein kisi cheej ki kami nahi rahi hai. Maine jo kuchh bhi chaaha wah ek ishaare par mere kadmon mein aa gira. Parantu kal raat tumhare sharir ko apnaane ke baad hi na jaane kyon mujhe aisa prateet hua maanon maine tum par bahut zulm kiya hai. Tumhari in kaali aankhon mein jaane kaisa jaadu hai ki inke pratibimb ko dekh kar mere andar ka maanav jaag utha hai. Mere andar ki insaniyat mujhe dhikkar rahi hai. Radha...kya tum mujhe kshama karke mujhe ek naya jeevan jeene ka mauqa nahi dogi?"

"raja saheb...!" radha ne bhige swar mein tadap kar kaha. - "main aapko kabhi kshama nahi karungi. Marte dam tak nahi. Aap insaan nahi shaitaan hain. Aapne mujhe shadi ke mandap se uthwate hue yah nahi socha tha ki mera budha baba mar jayega. Anginat logon ka dil toot jaayega. Raja saheb bhagwan kuchh nahi dekhta hai. Sabra karte hue sabki sunta hai. Dekh lijiyega daulat ka yah ghamand ek din chur chur ho jaayega. Aap kahin ke nahi rahenge. Meri siskiyan aapko kha jayengi. Meri aahen is khubsurat haveli ko khandhar bana kar rakh dengi."

"radha...!" surajbhan ne sabra se kaam liya. - "kal kisne dekha hai? Lekin phir bhi yadi main apne paapon ka pashchataap kar loon to kya tab bhi tum mujhe kshama nahi karogi?"

"kabhi nahi." radha atal mann se boli - " balki main chahungi ki bhagwan tumhe aisi jagah maare jahan tum paani ki ek boond ko bhi taras jao. tumhe chita bhi naseeb na ho. Tumhare sharir ko giddh aur kowwe noch-noch kar kha jaayen."

"nahi radha nahi. Mujhse itni nafrat na karo ki mera jeena mushkil ho jaaye. Tumhe mujhe kshama karna hi hoga. Main apne paapon ka aisa hi prayshcheet karunga."

radha kuchh kehti usse pehle hi mantri pratap singh ki awaaz surajbhan singh ke kaanon se takrai. - "maharaj, gaon se fariyadi aaye hain."

"tum inhe rangmahal pahuncha do. Hum abhi aate hain." surajbhan singh ne apni sthiti sambhal kar radha ki taraf ishara kiya.

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06-09-2020, 01:27 PM,
#5
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
mantri pratap singh radha ko rangmahal mein chhod kar chala gaya. Radha aakar palang par baith gayi. pairon ko upar sametkar usne ghutne ke charon aur apni baahen lapet lee. Aur gardan jhuka kar ek gaal ghutne par rakh liya. Uske maanas-patal bhola ki tashveer ghum gayi. Usnki palkon se aansu chhalak pade - " bhola...!" uske hothon se ek aah tapki. - "tumne mujhe kyon chhod diya? Kyon nahi apni jaan ki baazi laga kar mujhe bacha liya?" wah sisak padi.

Sahsa usne kadmon ki chaap suni to apne vichaaron se jaagi. Usne dekha surajbhan singh padhar rahe hain. Shaahi libaas mein lamba chauda sharir bahut khil raha tha. Wah radha ke sameep hi aakar khade ho gaye. Radha ne ghruna ke kaaran apni palken dusri aur fer lee.

"gaon wale apni fariyaad lekar aaye the." unhone kaha. - "kal raat kuchh luteron ne unke jhopdon mein aag laga di hai."

Radha usi prakaar baithi rahi. Ghruna se mann hi mann use kosti rahi. Gaon wale lootere ko jaan kar bhi anjaan the. Fariyaad bhi laaye to lootere ke paas.

"maine un sabhi ko hi muh maangi keemat de di hai. Isliye ki in looteron se main unki hifazat nahi kar saka. Maine unhe samjha diya hai ki ab yahan koi lootera nahi aayega. Maine bhola ki maang bhi puri kar di hai."

Radha ki bhigi palken upar ko uthi. Usne aashcharya se surajbhan ko dekha.

"haan...!" wah bole - "usne tumhari keemat pandrah hazaar lagayi. Kehne laga daakuon ne radha ko utha liya. Mandap mein aag laga di. Dahej ko aag mein feink diya. Paanch hazaar rupaye sath le gaye. Main jaanta hoon, mere logon ko aisa saahas kabhi nahi hoga. Rupaye to wah jitna chaahen mujhse le sakte hain. Parantu main chup hi raha. Tumko bhulne ke liye usne pandrah hazaar rupaye ki maang ki jo maine turant puri kar di."

"pandrah hazaar...!" radha ke honthon se achanak hi nikal gaya. radha ko bhola par bahut krodh aaya. Jeevan bhar usse pyar karne ka daawa karne wala keval pandrah hazaar mein hi fisal gaya. Uske pyar ke sahare hi to usne surajbhan ki eit se eit baja dene ki thani thi. parantu yah sab kya ho gaya? Bhola itni jaldi badal gaya. Yadi bhola itni jaldi badal gaya to bhala dusre log uska sath kyon dene lage. Phir bhi usne surajbhan ki baaton ke uttar mein kaha - yah jhooth hai. Bhola kabhi bhi meri keemat nahi laga sakta."

"yah sach hai radha." unhone gambhir hokar kaha - "yah baat tum usi se puchh lena. Maine uska dil tatola to usne spast shabdon mein keh diya ki ab wah tumhe kisi bhi avashtha mein swikaar nahi karega."

Radha ka dil toot gaya. Wah seer jhukaye sisak padi.

"radha, mujhe kshama kar do. Tum chaho to main tumhe apni patni banane ko taiyar hoon."

"patni...!" radha ne triskrut bhav se kaha - "bhartiya naari ek hi baar patni banti hai. Aur wah main ban chuki hoon. Bhola ki patni. Meri sagai uske sath bachpan mein hi ho chuki hai."

"lekin ab wah tumhe nahi apnayega."

"main khud bhi apna sab kuchh loot jaane ke baad uske paas nahi jaana chahti. khash kar aisi avashtha mein jabki usne mere dil ko sakht thes pahunchai hai. Lekin main marna bhi nahi chahti. Main apne khandaan ki aakhri nishani hoon. Main zinda rahungi aur zinda reh kar yah dekhna chahti hoon ki aise aadmi ka kya hashra hota hai jisne apne anand ke liye mera khaandan loot liya."

"radha...!" surajbhan ki palken bhig gayi. Radha ki baaten barchhiyon ki tarah unke dil par chubhne lagi. Wah bole - "kya is sansaar mein mere liye koi aisa prayshcheet nahi jiske kaaran tum mujhe pyar na sahi kshama hi kar sako?"

"hargiz nahi."

"Mera vishvash karo radha. Main tumhe chahta hoon, tumse pyar karta hoon. Tumhari khushi ke liye apna sab kuchh bhet chadha dena chahta hoon. Apna rajya, rajmahal sab kuchh tyaag dunga. Chaahen to mujhe aazma lo, meri pariksha le lo. Main kabhi bhi tumhe niraash nahi karunga."

"yadi aisi baat hai to mujhe azaad kar dijiye. Main apne baba ke paas jaana chahti hoon." radha ne yahan se bach nikalne ka raasta dhundha.

Surajbhan ke dil par niraasha ne dusri baat ki. - "theek hai radha. Tum apne ghar ja sakti ho. Ab main tum par koi dabav nahi daalunga."

Surajbhan ne taali bajayi. Tatkaal ek aadmi bhitar aaya.

"inhe surakhit mahal se baahar chhod aao." unhone apne aadmi ko aadesh diya.

Radha gupt raaston se hoti hui mahal se baahar nikal gayi.
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06-09-2020, 01:27 PM,
#6
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
अपडेट 2

राधा ने घर का दरवाज़ा खाट-खाटाया. दरवाज़ा खुला. उसका बूढ़ा बाबा प्रकट हुआ. कमज़ोर, दुबला पतला, दाढ़ी और सिर के बालों पर सफेदी छाई थी. पलकें धसि हुई थी. आँखों के चारों और गहरे गड्ढे पड़े हुए थे. राधा को देखते ही बाहें फैलाकर उसने राधा को गले से लगा लिया. राधा सिसक कर उससे लिपट गयी. फुट फुट कर रो पड़ी. तभी घर के बाहर कुच्छ लोगों की ख़ुसर-पुसर होनी शुरू हो गयी.

बाबा के साथ राधा अंदर पहुँची. उसने देखा घर के अंदर हर चीज़ अस्त-व्यस्त है. मंडप जला हुआ है. राधा का दिल तड़प उठा. वह दूसरे कमरे में पहुँची. वहाँ अनगिनत मूर्तियाँ टूटी बिखरी पड़ी थी. किसी के हाथ अलग थे तो किसी का सिर. राधा आश्चर्य से देखने लगी.

"इन मूर्तियों को मैने तोड़ डाला." बाबा ने कहा - "गम बर्दास्त नही कर सका तो अपना गुस्सा इन पर उतार दिया."

"बाबा...!" राधा सिसक कर बोली - "मैं क्या करूँ, मैं लूट गयी. राजा..."

बाबा ने लपक कर उसका मूह बंद कर दिया. - "मत ले उसका नाम बेटी. वरना जो बाकी रह गया है वह भी समाप्त हो जाएगा. वह हमे तेरे बाप की तरह किसी अपराध में फसा कर बे मौत मार डालेगा. उसके हटकंडो को कौन नही जानता. दौलत के कारण यहाँ के कुच्छ सरगना भी उसका साथ दे रहे हैं. तुम्हारा भोला भी तो..."

"मुझे मालूम है बाबा. भोला बिक चुका है, पंद्रह हज़ार में. अच्छा हुआ जो मेरा विवाह उस कायर से नही हुआ."

"अब हम यहाँ नही रहेंगे बेटी. यह जगह हमारे लिए नर्क से भी बदतर है." बाबा ने सिसक कर राधा को अपने गले से लगा लिया.

बाबा ने अपना थोड़ा ज़रूरी सामान जमा किया. उसे चादर में बाँध कर अपने बूढ़े कमज़ोर कंधे पर डाल लिया और राधा को लेकर बाहर निकल गया.

कच्ची सड़क, पगडंडी, खेतों की मेध तथा उबड़ खाबड़ रास्ता पार करने के बाद जब वे बहुत दूर पहुँचे तो राधा ने पलट कर अपने गाओं को देखा. जहाँ उसका बचपन बीता था. अपना गाओं, अपने खेत, इन खेतों की हरी भरी उपज पर उड़ते परिंदों को देख कर राधा की आँखें भर आई. अचानक उसने उड़ती हुई धूल के साथ घोड़े की टापो की आवाज़ सुनी. उसका दिल बुरी तरह घबरा उठा. बाबा ने लपक कर उसे छाती से लगा लिया. वे दोनो छिपने के लिए इधर उधर स्थान ढूँढने लगे. किंतु समय कम था. उन्होने देखा घुड़सवार समीप आ पहुँचे थे. घुड़सवार दो थे, राजा सूरजभान सिंग तथा मंत्री प्रताप सिंग.

राधा सहम कर बाबा से लिपट गयी.

"राधा...!" सूरजभान समीप आकर बोले - "तुम चाहो तो यहाँ रह सकती हो. तुम पर उंगली उठाने वाले का हम सिर कलम करा देंगे."

राधा चुप रही किंतु बाबा से सहन नही हुआ. उसके खून में ना जाने कहाँ से गर्मी आ गयी. वह राधा को छोड़ कर उनके समीप पहुँचा और क्रोध में भर कर बोला - "राजा साहब किसी को मार कर कीमती कफ़न पहना देने से पुन्य नही हो जाता. राधा को तुम्हारे रहमो करम पर छोड़ देने से अच्छा है कि मैं इसका गला घोंट दूं."

मंत्री प्रताप सिंग अपने मालिक के विरुढ़ एक छोटे से आदमी का यह तिरस्कार सहन नही कर सका. उसने हाथ में पकड़ा कोड़ा हवा में लहराया और पलक झपकते ही उसे बाबा पर दे मारा. बाबा का बूढ़ा शरीर एक ही वार में घायल होकर गिर पड़ा.

"प्रताप सिंग..." राजा सूरजभान सिंग ज़ोर से चीखे. प्रताप सिंग की यह हिमाकत उन्हे ज़रा भी पसंद नही आई.

राधा बचाव में बाबा के शरीर से लिपट गयी.

"मार डालो. मार डालो हमें." राधा तड़प कर चीख उठी - "ज़ालिम, पापी, नीच."

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06-09-2020, 01:27 PM,
#7
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
प्रताप सिंग बल खाकर रह गया.परंतु राजा सूरजभान सिंग के होठों पर एक आह उभर आई. घोड़े से उतर कर राधा के समीप आए. फिर दर्द भरे स्वर में बोले - "ठीक है राधा. तुम यहाँ नही रहना चाहती ना सही. लेकिन जहाँ कहीं भी रहना इतना ज़रूर याद रखना अगर मुझे क्षमा करने की कोई कीमत हो तो उसे वसूल करने से मत हिचकिचाना. मैं किसी भी कीमत पर अपने पापों का प्रायशचित करने को तैयार हूँ." फिर सूरजभान सिंग पलट कर घोड़े पर सवार हुए, मंत्री प्रताप सिंग की तरफ देखा और घोड़े को महल की दिशा में दौड़ा दिए.

उनके ओझल होते ही राधा ने अपने बाबा को उठाया और एक अंजान मंज़िल की यात्रा पर आगे बढ़ गयी.

*****

सुबह के 5 बज रहे थे. सूरजभान बिस्तर पर लेटे इस उधेड़-बुन में थे कि उन्हे राधा से मिलना चाहिए या नही. राधा के गाओं छोड़ कर जाने के लगभग एक महीना बाद उसकी खबर उन्हे मिली थी. वह कृष्णा नगर में अपने बाबा के साथ रह रही थी. उन्होने अपने मन को समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकाम रहे. सुबह पौ फटने से पहले ही बहाल से होकर बाहर निकल आए. कुच्छ देर महल के लॉन में टहलते रहे फिर अचानक ही एक विचार से उनके शरीर में तेज़ी आ गयी. अंदर जाकर उन्होने जल्दी से कपड़े बदले. कुर्ता पायज़ामा ही पहन लिया. फिर अस्तबल से घोड़ा लेकर कृष्णा नगर के लिए चल पड़े.

कृष्णा नगर समीप आया तो दिन चढ़ आया था. कृष्णा नगर के समीप एक टीले पर घोड़े को चढ़ा कर उन्होने दूर तक दृष्टि डाली. कृष्णा नगर छोटा सा गाओं था. कुच्छ बच्चे धूप में खेल रहे थे. उन्होने चाहा कि उनमे से किसी के समीप जाकर राधा के बारे में पुच्छ-ताच्छ करे कि तभी उनकी नज़र टीले की जड़ से लगी पगडंडी पर जाती एक लड़की पर पड़ी. सेर पर लकड़ी का गठ्ठर होने की वजह से उसका मुखड़ा दिखाई नही पड़ रहा था. लेकिन शरीर की बनावट से अनुमान होता था वह यौवन की अंगड़ाई में है. उन्होने घोड़े को लड़की के पिछे दौड़ा दिया.

घोड़े की टाप सुनकर लड़की ठिठक गयी. उसने सिर उठा कर देखा तो पग डगमगा गये. शरीर काँप गया. सिर पर रखा गठ्ठर नीचे गिर पड़ा. उसने चाहा कि तुरंत भाग जाए परंतु तब तक सूरजभान सिंग उसके समीप आ चुके थे.

"राधा...!" उन्होने घोड़े से उतर कर दर्द भरे स्वर में कहा. - "क्या तुम अब भी मुझे क्षमा नही करोगी? तुम्हे ढूँढने ही निकला था. आओ चलो मेरे साथ."

और राधा उन्हे आश्चर्य से देखने लगी. कुर्ता-पायज़ामा बहुत लापरवाही से पहन रखा था. पसीने से भीग कर उनके बदन से चिपक गया था. बाल उलझे हुए थे, आँखों में गहरी उदासी, होठों पर वास्तविक क्षमा की माँग. उसके दिल को एक सच्ची शांति मिली. उसके मन ने एक सच्ची खुशी का आभाष किया. राम गढ इलाक़े का राजा अपना राजमहल छोड़ कर एक गोरी की कुटिया में भीख माँगने आया है. उससे क्षमा माँगने आया है. भिखारी...! राजा सूरजभान सिंग भिखारी...! उसका जी चाहा वह ज़ोर ज़ोर से हासे. शोर मचा कर लोगों को बताए कि देखो एक ग़रीब अबला की 'आह' ने क्या रंग दिखाया. एक राजा तड़प रहा है. उसके प्रेम में जल रहा है. और जलता रहेगा तब तक जब तक कि यह आग उसे जला कर भस्म ना कर दे. हा...हा...हा...! परंतु वह ऐसा नही कर सकी. दिल के अंदर जाने ऐसी कौन सी ताक़त थी जिसने उसके मूह पर ताला लगा दिया. वरन उसकी आँखें उदास हो गयी. चाह कर भी वा मूह से एक शब्द नही कह पाई.

"मेरा विश्वास करो राधा." सूरजभान सिंग आगे बोले. - "मैं अपने बाप-दादो की तरह नही हूँ जो रोज़ नयी लड़कियों से आनंद उठाना अपनी शान समझू. तुम चाहोगी तो मैं अपना राज्य, राजमहल सब कुच्छ त्याग दूँगा. जहाँ चाहोगी वहाँ चला चलूँगा. केवल मुझे क्षमा कर दो. क्षमा करके मुझे अपना बना लो." उनकी आवाज़ भर्रा गयी. क्षमा के लिए उन्होने वास्तव में उनके आगे अपने हाथ जोड़ दिए थे.

राधा ने देखा, उनके बढ़े हुए हाथ की उंगलियों में बहुमुल्य हीरों की अंगूठी है. परंतु एक अंगूठी चाँदी की भी है, जिस पर उसका नाम अंकित है...'राधा'. जो भोला की दी हुई थी. उसे सख़्त आश्चर्य हुआ.

"यह अंगूठी अब तभी मेरी अंगुली से उतरेगी जब तुम मुझे क्षमा कर दोगि. क्षमा करके इसे अपनी उंगली में पहन लोगि." उन्होने राधा के मन का भाव समझ कर अपने आप कहा. - "तुम्हारे बाकी गहने भी मेरे पास सुरक्षित हैं. मेरे लिए वे देवी की मूर्ति से भी पवित्र हैं."

राधा के होठ काँप गये. जाने ऐसी कौन सी बात थी कि सूरजभान सिंग से सख़्त घृणा के पश्चात भी उसके दिल पर बरच्छियाँ चल गयी. उसकी पलकों पर ठहरी मोटी मोटी बूंदे गालों पर लुढ़क आईं.वह सोचने लगी. क्या ऐसा संभव है. एक राजा जिसके लिए लड़कियाँ खेल तमाशे भर रही हो. वह गाओं की एक साधारण लड़की से प्रेम करेगा. क्या वह उसे अपनी बना सकता है?

राधा के होठों पर एक सिसकी उभरने को तड़प उठी तो वह सामने की ओर देखने लगी. फिर अचानक ही उसे क्या हुआ कि वह वहाँ से भाग गयी. चुप-चाप बिना किसी बात का उत्तर दिए.

सूरजभान सिंग उसे जाते हुए देखते रह गये. उसके इस तरह चले जाने से उनके दिल को ठेस लगी. पर उन्हे ये संतोष था कि आज राधा ने उसे बुरा भला नही कहा. उसे कोसा नही. उन्होने एक गहरी साँस ली फिर घोड़े पर बैठ कर अपने इलाक़े की ओर चल पड़े. छोटे छोटे बच्चे बहुत आश्चर्य से उन्हे देख रहे थे. वह हल्के से होठ दबा कर मुस्कुरा दिए.
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06-09-2020, 01:27 PM,
#8
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
सूरजभान सिंग रामगढ लौटने के पश्चात मंत्री प्रताप सिंग को बुला कर राधा से हुई भेंट की जानकारी दी और कहा कि कल वे पूरे क़ाफ़िले के साथ कृष्णा नगर जाएँगे और राधा को पूरे सम्मान के साथ लेकर आएँगे. राधा की खामोशी ने उनके अंदर ये विश्वास जगा दिया था कि वह उन्हे क्षमा कर देगी.

अगले रोज़ सूरजभान सिंग एक छोटा मोटा क़ाफ़िला लेकर कृष्णा नगर के लिए रवाना हुए. कृष्णा नगर के समीप पहुँच कर क़ाफ़िले को रोक दिया और मंत्री प्रताप सिंग के साथ गाओं के अंदर परविष्ट हो गये.

दोनो घोड़े पर सवार बस्ती में पहुँचे तो उन्हे देखने वालों की भीड़ जमा होने लगी. छोटे बच्चे उनके पिछे हो लिए. एक जगह पर रुक कर सूरजभान ने घोड़े की लगाम खींची तो प्रताप सिंग घोड़े से उतर गया. एक बूढ़ा आदमी खड़ा बहुत गौर से इन्हे देख रहा था. वह उसी के पास पहुँचा.

"बाबा, यहाँ कोई राधा नाम की लड़की रहती है? उसके साथ उसका बूढ़ा बाबा हरीदयाल भी है. दोनो कुच्छ ही दिन पहले रामगढ से यहाँ आकर बसे हैं."

"कहीं आप उस आदमी की तो बात नही कर रहे हैं जो मूर्तियाँ बनाता है?"

"हां...हां वोही. हम उसी की बात कर रहे हैं." दोनो ने एक साथ कहा.

"वे लोग तो चले गये."

"कहाँ...?" सूरजभन ने चौंक कर पुछा.

"कुच्छ पता नही. इस बात का पता हमें कल रात चला जब मेरी पत्नी उनके लिए रोटी लेकर गयी."

"रोटी?"

"हाँ. केयी दिनो से उन्होने कुच्छ नही खाया था. हम उनकी मदद करना चाहते थे पर वे मुफ़्त में किसी प्रकार की सहायता लेना पसंद नही किए. इसलिए मैने उनसे भगवान कृष्णा की एक मूर्ति खरीद ली. दिन के वक़्त मैं खुद खाना बना कर उन्हे देने चला गया था. राधा को तो बुखार भी था. फिर भी पता नही क्यों वे लोग चले गये."

सूरजभान सिंग के दिल पर बिजली गिर पड़ी. उन्होने माथा पकड़ लिया. उनकी आँखें छलक पड़ी. वे खुद से बड़बदाए - "नही ऐसा नही हो सकता. राधा कहीं नही जाएगी. मैं उसे ढूँढ कर ही दम लूँगा. बस्ती-बस्ती, शहर-शहर, देश-विदेश वह जहाँ कहीं भी होगी मैं उसे खोज निकालूँगा. उसकी खोज में अपनी सारी दौलत लूटा दूँगा. पर उसे पाकर ही रहूँगा."

प्रताप सिंग ने उन्हे धीरज बँधाया. सूरजभान ने उस बूढ़े से भगवान कृष्णा की मूर्ति खरीद ली फिर दोनो पिछे लौट गये.

दीन बीते. केयी दिन बीते. लगभग एक वर्ष बीत गया. सूरजभान ने राधा की खोज में दूर दूर तक अपने आदमी भेजे पर उसका कहीं भी पता नही चला. सूरजभान राधा की याद में सुखते चले गये.

फिर वह दिन भी आया जब भारत का पुनर्जन्म हुआ. 15 अगस्त 1947. भारत गुलामी की बेड़ियों से आज़ाद हो गया. सूरजभान तथा दूसरे सभी राजाओं की रियासत ख़त्म हो गयी. परंतु सूरजभान को इसका दुख नही था. उनके पास अभी भी इतनी दौलत थी कि उनके कयि पीढ़ियों तक को काम करने की ज़रूरत महसूस नही होने वाली थी. सूरजभान ने पूरे गाओं के लोगों में कंबल और अनाज बाँटे. लोग उनके बदले हुए स्वाभाव से हैरान थे.

कुच्छ दिनो बाद सूरजभान किसी काम से देल्ही गये. वह एक भीड़ भरे बाज़ार से गुज़र रहे थे कि तभी उनकी दृष्टि राधा पर पड़ी. उन्होने उसका घर तक पिछा किया. फिर लोगों से पुच्छ-ताछ भी किए. पता चला फादर फ्रांसिस नाम के किसी पादरी ने उन्हे रहने के लिए घर मूहाय्या कराया है. फादर फ्रांसिस एक नेक़ दिल इंसान थे. भूले भटकों को शरण देना उनके स्वाभाव में था. उनका अपना स्कूल और अस्पताल था. जहाँ मुफ़्त शिक्षा और मरीजों को मुफ़्त में इलाज किया जाता था.

सूरजभान सिंग फादर फ्रांसिस से मिलने उनके घर पहुँचे. उनसे मिलकर उनके सामने अपना हृदय खोल कर रख दिया.

"राजा साहेब, सुबह का भुला अगर शाम को घर लौटे तो उसे भुला नही कहते" फादर को उनसे सहानुभूति हुई - "मुझे राधा अपने बाबा के साथ सड़क पर बेहोंशी की हालत में पड़ी मिली थी. वे लोग कयि दिनों के भूखे प्यासे भी थे. मैं उन्हे अपने अस्पताल ले आया. उसका इलाज कराया. उसकी आप-बीती सुन कर मुझे उस पर बड़ी दया आई. अपनी कहानी सुनते समय राधा ने आपके विरुढ़ इतनी घृणा प्रकट की थी कि मैं खुद भी..." फादर कहते कहते चुप हो गये.

"उसने जो कुच्छ भी कहा वह सत्य ही है." सूरजभान ने गंभीर होकर कहा. - "वह कभी इस बात पर विश्वास करना ही नही चाहती कि मैं बदल चुका हूँ. इसलिए अब आप ही कोई ऐसा मार्ग बताएँ कि जिस पर चल कर मैं राधा का विश्वास जीत सकूँ. उसे अपना बना सकूँ."

"इसके काई रास्ते हैं." फादर ने कुच्छ सोचकर कहा. - "मेरा मतलब, राधा एक ग़रीब लड़की है. उसका बाबा एक खुद्दार आदमी है अकारण किसी की सहायता लेना पसंद नही करता. इसलिए आप चाहें तो उनकी परेशानी दूसरे तरीकों से हल कर सकते हैं. राधा के बाबा एक मूर्तिकार हैं आप चाहें तो उनकी मूर्तियाँ अपने किसी आदमी के ज़रिए अधिक से अधिक दाम देकर खरीद सकते हैं. उसे कोई अच्छा काम दे सकते हैं. आपकी जानकारी के लिए एक और बात बता दूं कि राधा आपके बच्चे की मा बन चुकी है. आप चाहें तो उस बच्चे को अच्छी ट्रैनिंग दिला सकते हैं. उसे पढ़ा सकते हैं. पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दिलवा सकते हैं. आपके इस प्रकार की सहायता से राधा को किसी बात का ज्ञान भी नही चलेगा. भविश्य में जब कभी राधा को यह मालूम होगा कि आपने बिना किसी स्वार्थ के छिप छिप कर ऐसा किया है. उसका जीवन सुधर दिया. उसके बच्चे का भविश्य बनाने में कोई कमी नही रखी तो निसचिंत ही वह आपको क्षमा कर देगी और आपके पास चली आएगी."

"अफ ! बस...बस फादर. अब मैं सब समझ गया." सूरजभान तड़प कर बोले. उनकी आँखें खुशी से चमक उठी. फादर फ्रांसिस की सलाह को उन्होने दिल ही दिल में प्रशन्शा की. - "आपने जो जो कहा है, मैं वह सब करूँगा. उसकी खुशी के लिए ज़रूरत पड़ी तो अपना सब कुच्छ भेंट चढ़ा दूँगा. पर उसका विश्वाश जीत कर रहूँगा."

सूरजभान ने इस सहयोग के लिए फादर के अस्पताल के लिए एक मोटी रकम दान में दिया. फिर जाने के लिए उनसे आग्या माँगी. वह जाने के लिए मुड़े ही थे कि तभी उनकी नज़र सामने की टेबल पर रखी पत्थर की एक मूर्ति पर पड़ी. प्रभु जीसस की मूर्ति. वह पत्थर उन्हे जाना पहचाना सा लगा.

"फादर, क्या यह मूर्ति राधा के बाबा की बनाई हुई तो नही है?"

"आपका अनुमान सही है." फादर मुस्कुरा कर बोले. - "यह मूर्ति राधा के बच्चे के जन्म के बाद उसके बाबा ने मुझे भेंट की थी."

"अगर आपको इस मूर्ति की अधिक ज़रूरत नही है तो मुझे दे दीजिए"

"ओह्ह ! ज़रूर...ज़रूर." फादर ने तुरंत उस मूर्ति को उठा कर उनके हाथ में थमा दिया. - "लेकिन क्या मैं इसका कारण जान सकता हूँ?"

"बस यूँ समझ लीजिए कि मैं राधा से संबंधित हर चीज़ को अपने पास रखना चाहता हूँ. आप निश्चिंत रहें, हमारी जाती से यीशू मसीह के व्यक्तित्व को कभी भी ठेस नही पहुँचेगी. हम सभी धर्मों का आदर करते हैं."

फादर के होंठ मुस्कुरा उठे. - "राधा के प्यार ने आपको बहुत ज़ज़्बाती बना दिया."

सूरजभन हल्के से मुस्कुरा दिए. फिर उनसे हाथ मिला कर बाहर निकल गये.
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06-09-2020, 01:28 PM,
#9
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
सुबह का समय था. राधा अपने छोटे से घर पर झाड़ू लगा रही थी. घर छोटा सा था. दो कमरे थे. एक बड़ा एक छोटा. अंदर के बरामदे में रसोई था. एक छोटा सा आँगन भी था. आँगन का दरवाज़ा बाहर सड़क की ओर खुलता था. यह घर फादर फ्रांसिस के स्कूल के बिल्कुल पास था.

सहसा किसी ने आँगन का दरवाज़ा खत-ख़ाटाया. राधा ने झाड़ू एक किनारे रखी और आँचल संभालते हुए लपक कर दरवाज़ा खोल दिया.

सामने एक लंबा चौड़ा आदमी खड़ा था. उसके बाल भूरे कम और सुनहरे अधिक थे. भूरी फ्रेंच कट दाढ़ी, आँखों पर मोटा चस्मा तथा कीमती चस्मा था. सिर के उपर ईव्निंग कॅप थी जिसे आँखों के उपर कुच्छ अधिक ही झुका कर उसने पहन रखा था. कीमती सफेद सूट में वह किसी स्टेट का राजकुमार लगता था. राधा उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना ना रह सकी. वह सूरजभान थे. किंतु राधा उनके बदले हुए रूप की वजह से उन्हे पहचान नही सकी.

"आप किससे मिलना चाहते हैं?" राधा ने आश्चर्य से देखते हुए पुछा.

"मैं बाबा हरीदयाल से मिलना चाहता हूँ. जो मूर्तिकार हैं." अपने आप पर काबू पाकर सूरजभान ने कहा.

उसकी आवाज़ सुनकर राधा काँप गयी. उसे लगा जैसे उसने पहले भी कहीं इस आवाज़ को सुन रखी हो. लेकिन कब, कहाँ उसे याद नही आ सका.

सूरजभान ने उसे खोया देखा तो उसका ध्यान अपनी ओर खींच कर कहा - "मेरा नाम राजेश है. मैं मूर्तियों का व्यापारी हूँ. मुझे फादर फ्रांसिस ने भेजा है. मैने आपको तथा आपके बाबा को वहाँ देखा था. हमारी भेंट हुई थी. पर शायद आपको याद नही."

"ओह्ह...! जी हां...जी हां, शायद." राधा ने सोचा शायद उसने वहीं इस आदमी को देखा हो. उसने उन्हे अंदर आने का रास्ता दिया. - "आप बैठिए, मैं अभी बाबा को बुला कर लाती हूँ."

"क्या वे घर पर नही हैं?"

"ऐसे वक़्त पर बाबा फादर फ्रांसिस के स्कूल में होते हैं."

"आपके बाबा क्या वहाँ काम करते हैं?"

"जी हां..."

"तो फिर मूर्ती किस वक़्त बनाते हैं?"

"अधिकांश शाम को, स्कूल से आने के बाद."

"तब तो उन्हे बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी."

"मेहनत नही करेंगे तो गुज़ारा कैसे चलेगा? एक छोटा बच्चा है, उसे पढ़ा लिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहती हूँ."

"क्या आपके पति आपकी कोई सहायता नही करते?" सूरजभान ने उसका दिल टटोला.

उत्तर में राधा की आँखों से आँसू बह निकले. उदास चेहरा लिए नीचे देखने लगी.

"क्षमा चाहता हूँ. मैने शायद आपके किसी दुख को जगा दिया है."

"कोई बात नही." राधा अपने आँसू पोछ्ती हुई बोली. - "मैं अभी आई." राधा उन्हे बैठने के लिए कुर्सी देकर बाहर निकल गयी.

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06-09-2020, 01:28 PM,
#10
RE: Kamukta Story कांटों का उपहार
उसके जाते ही सूरजभान अंदर के कमरे में दाखिल हुए. अंदर एक चारपाई बिछि हुई थी जिस पर उसका नन्हा सा गोरा चिटा बेटा सो रहा था. सूरजभान अपने आप पर काबू नही पा सके, झुक कर उसका माथा चूम लिया. चुंबन के एहसास से बच्चे की आँख खुल गयी. उसकी आँखों में सूरजभान ने अपनी परच्छाई देखी. वही आँखें, वही रूप. बच्चा पूरी तरह से उन्ही पर गया था. उन्हे देख कर बच्चे ने मुस्कुराया. सूरजभान ने तड़प कर उसे गोद में उठा लिए. फिर दीवानो की तरह उसे चूमते चले गये. ना जाने कितनी देर बच्चे से खेलते रहते कि तभी दरवाज़े के बाहर आहट हुई. वह फुर्ती से बच्चे को चारपाई पर लिटा कर पहले कमरे में आ गये.

राधा अपने बाबा के साथ अंदर आई.

"कहिए, किस तरह की मूर्तियाँ खरीदना चाहते हैं आप?" बाबा ने उन्हे गौर से देखते हुए पहले झुक कर अदब से सलाम किया फिर पुछा.

"आपके पास इस वक़्त जैसी भी हों मुझे दिखा दीजिए."

"बाबू साहब, इस वक़्त तो मेरे पास केवल एक ही मूर्ती है, और वह भी अधूरी. आप दो दिन बाद आएँ तो मैं उसे पूरी कर दूँगा."

"क्या मैं उसे देख सकता हूँ."

"हां...हां क्यों नही. अंदर आइए." बाबा दूसरे कमरे में दाखिल हुआ.

राधा और सूरजभान भी पिछे पिछे चले आए. सूरजभान ने सरसरी निगाह से एक बार फिर बच्चे की तरफ देखा. बच्चा जाग रहा था. राधा ने उसे गोद में उठा लिया.

"बहुत प्यारा बच्चा है." सूरजभान ने कहा. - "क्या नाम है इसका?"

"कमल...!" राधा ने धीरे से कहा.

बाबा ने अधूरी मूर्ति उठा कर सूरजभान को थमा दिया. - "अगर छुट्टी होती तो आज ही पूरी कर देता. थोड़ा थोड़ा समय देना पड़ता है. आप इसे कल ले जा सकते हैं."

"लेकिन इस प्रकार तो यह अच्छी लग रही है."

"इस प्रकार...?"

"हां...हां और क्या?" सूरजभन ने मूर्ति को उलट पुलट कर देखते हुए कहा. - "इसे ही तो मॉडर्न आर्ट कहते हैं. विदेश में तो इन मूर्तियों का बहुत दाम दिया जाता है."

"विदेश में?" बाबा ने उन्हे आश्चर्य से देखा. राधा भी हैरान थी.

"हां...हां और क्या? मैं इसके 200 रुपये दूँगा."

"200 रुपये." बाबा इतनी बड़ी रकम का नाम सुनकर हैरान रह गया. उसने आज तक किसी भी मूर्ती को 10 रुपये से अधिक दाम में नही बेचा था.

"अच्छा 300 रुपये ले लो." सूरजभान बिना एक पल देर किए कहा.

"300 रुपये." राधा को अपने कानो पर विश्वाश नही हुआ.

"अच्छा बाबा, यह लो 500 रुपये." सूरजभान ने कोट की जेब से सौ सौ के पाँच नोट निकाल कर बाबा के हाथों में थमा दिए.

बाबा फटी फटी आँखों से सूरजभान को देखता ही रह गया.

"मैं इसे दुगुनी दाम में विदेश में बेचुँगा. आज से मैं आपका ग्राहक हूँ." राजेश ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकालते हुए कहा. - "इसलिए मेरी और से इस बच्चे के लिए यह छोटी सी भेंट स्वीकार कीजिए." सूरजभान ने राधा की तरफ नोट वाला हाथ बढ़ा दिया.

राधा उनके हाथ में थमे नोट को लेने से इनकार नही कर सकी. प्रेम से दिया हुआ उपहार स्वीकारणीय होता है.

सूरजभान बच्चे का गाल थप-थपा कर आँगन का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया.
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