kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
08-17-2018, 02:30 PM,
#1
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कामुक-कहानियाँ

शादी सुहागरात और हनीमून


लेखक -क्यूट रानी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा फिर हाजिर हूँ इस कहानी के साथ दोस्तो ये कहानी मैने बहुत समय पहले पढ़ी थी कहानी इतनी अच्छी लगी कि मैं इसे हिन्दी मे डब करने नही रोक पाया दोस्तो ये कहानी क्यूट रानी ने हिंगलिश मे लिखी थी

बात उन दिनो की है जब मे जवानी की दहलीज पे तो कदम रख चुकी थी पर अभी बचपन को अलविदा नही कहा था. बरस पंद्रह या सोलह का सीन, जवानी की राते मर्दों के दिन वाली उमर थी. बिना बात के दुपट्टा सीने से ढालकता था, अंगड़ाइया आती थी. नहाते समय जब मे अपनी गोलाइयाँ देखती तो खुद शर्मा जाती थी, लेकिन फिर उन्हे प्यार से, हल्के से कभी छूती थी कभी सहलाती थी. और कभी नीचे झुक के अपनी थोड़ी थोड़ी केसर क्यारी आ चुकी थी, उसे देख के खुद लजा जाती.. ऐसी बात नही थी कि मुझे देह के बारे मे कुछ पता नही था. भाभी के कमरे से 'स्त्री पुरुष' और ऐसी ही एक दो और कहानियाँ पढ़ के, औरतो की कितनो से, ख़ासकर सलाह और डाक्टर से पूछिए, ऐसे कलमो से और सबसे बढ़कर घर मे ही इतना खुला माहौल था कुछ भी परदा या बड़े छोटे का लिहाज या छिपाव दुराव नही था. खास कर काम करने वालियाँ, उंगली के इशारे से, गंदे खुले मज़ाक से, जब मे अकेली होउ या अपनी सहेलियो के साथ तो सब कुछ खुल के कह देती थी. उन्हे ही क्यो मेरी भाभी भी, सिर्फ़ मज़ाक नही उनकी चिकोतियाँ, चिडाने बिराने और यहाँ वहाँ मौका पाके हाथ रगड़ने लेकिन सच बताऊ तो जवानी की दस्तक का अहसास कराया मुझे फ़िकरे कसने और सिटी बजाने वाले लड़को ने. 'न सोलह से ज़्यादा ने पंद्रह से कम' जब वो कहते तो हम शरम से गर्दन झुका के अपनी चुन्नियाँ कस के अपने सीने से दबा के निकल जाती. लेकिन उनके दूर होते ही एक दूसरे को छेड़ती, और कहती, हे ये तेरा वाला था. न जाने किस किस तरह के ख्वाब थे, बार बार छज्जे पे जा के खड़ी हो जाती. इवनिंग बुलेटिन की जगह अब एम & बी ने ले ली थी. लेकिन उसके साथ ही ये बात भी थी, बड़े अभी भी मुझे बच्ची ही समझते. मम्मी अक्सर टोक देती अभी तो तुम बच्ची हो ये बडो की तरह बात मत करो और ये बात सही भी थी कि मे अभी भी कभी कभी छत पे रस्सी कुदति या मन करता तो मुहल्ले के बच्चो के साथ इक्कत दुक्कत भी खेल आती. लेकिन मुझे बस ये मन करता था कि घर के लोग तो मुझे अब बच्ची मानना बंद कर दे.

ये एक दिन हो गया. लेकिन जिस तरह से हुआ, मेने कभी सोचा भी नही था. हुआ ये कि मेरी दादी आई, उनकी कुछ तबीयत खराब थी. गाव मे ठीक से उनका इलाज हो नही पा रहा था. मेरी तो चाँदी हो गयी क्योंकि वो मेरी फैवरेत दादी थी, मे उनकी फेवोवरिट पोती. लेकिन उन्होने एक दिन एलान कर दिया और उस एलान का असर किसी मुल्क के ऐलाने जंग से कम नही था. वो एलान ये था कि उनके ख्याल से मे बड़ी हो गयी हू और यहाँ तक तो उनसे मेरा पूरा इत्तेफ़ाक था, लेकिन उसके साथ उन्होने ये भी जोड़ दिया कि, मेरी शादी तुरंत कर देनी चाहिए. उसमे उन्होने एक एमोशनल तुरुप का पत्ता जड़ दिया कि उनकी तबीयत खराब रहती है, इसलिए उन्हे कुछ हो जाय तो उसके पहले वो अपनी इकलौती पोती की शादी देखने चाहेंगी. पापा तो अपनी मा के एकलौते लड़के थे, इसलिए दादी की बात टालने तो वो सोच भी नही सकते थे, पर मम्मी ने कुछ रेज़िस्ट किया कि शादी कोई गुड्डे गुडियो का खेल तो है नही. फिर बड़ी हिम्मत कर के वो दादी से बोली,

"अभी इसकी उमर ही क्या है. अभी कुछ दिन पहले सत्रहवा लगा है, बारहवे मे अभी गयी है. अभी तो.."

दादी सरौते से छ्चालियाँ कुटर रही थी, बिने रुके बोली, "अरे, इसकी उमर की बात कर रही है. तुम्हारी क्या उमर थी, जब ब्याह के मे इस घर मे ले आई थी. मुश्किल से सोलहवा पूरा किया था, और शादी के ठीक नौ महीने गुज़रे जब तुम इसकी उमर की थी तो ये चार महीने की तुम्हारी गोद मे थी."

भाभी तो खुल के मम्मी को देख के मुस्करा रही थी और मे दूसरी तरफ देखने लगी जैसे किसी और के बारे मे बात हो रही हो. दादी को अड्वॅंटेज मिल चुका था और उसे कायम रखते हुए, उन्होने मुस्कराते हुए बात जारी रखी, "और पहले दिन से ही शायद ही कोई दिन बचा हो जब नागा हुआ हो याद है कभी अगर मे तुम्हे थोड़ी देर भी ज़्यादा रोक लेती थी तो तुम्हे जम्हाईयाँ आने लगती थी" मम्मी नई नेवेली दुल्हन की तरह शर्मा गयी और अब मे और भाभी खुल के मुस्करा रहे थे. सीधे मुक़ाबले में तो अब कुछ हो नही सकता था, इसलिए संधि प्रस्ताव लेके मुझे दादी के पास भेजा गया. तय ये हुआ कि पोती और दादी मिल कर तय करेगिं और जो फ़ैसला होगा वही अंतिम होगा. जैसे लड़ाई जीत लेने के बाद विजेता फूल कर कुप्पा हो जाता है, वही हालत दादी की थी. सिर्फ़ हम दोनो कमरे मे थे. दादी ने बहोत मेरी मन मन्नोवल की और मुझसे पूछा कि मुझे क्या डर है.

मे बोली, " कल आप कहेंगी कि मुझे तेरे बच्चे का मूह देखने है तो फिर मुझे नही करना है ये सब."

वो मान गयी. तय ये हुआ कि शादी के अगले 4-5 साल तक बच्चे की कोई बात नही होगी और तब तक दादी ना सिर्फ़ कोई शर्त रखेगी, बल्कि बीमार क्या उन्हे जुकाम बुखार भी नही होना चाहिए. जो हालत अगस्त मुनि की थी जो उन्होने विंध्याचल पर्वत से शर्त रखी थी वही मेरी हुई. ये भी मेरी बात मान ली गयी कि लड़का मे देखूँगी, मेरी पसंद से ही शादी तय की जाएगी. मे ग्रॅजुयेशन तक पढ़ाई जारी रखूँगी, आगे हम दोनो की मर्ज़ी.

मेने ये भी कहा कि मे ड्रेस भी पहनने जारी रखूँगी तो दादी ने मेरे गालो पे प्यार से चिकोटी काट के कहा, "अरे मुझ मालूम है तू अपने दूल्हे को पटा लेगी, फिर तो ये तुम दोनो के हाथ मे है," भाभी ने बात पूरी की,

" क्या पहनो या क्या ना पहनो वैसे बन्नो मेरी मानो तो वो तुम्हे कुछ भी नही पहनने देगा. शादी के बाद कुछ दिन तो कपड़ो की ज़रूरत पड़ती नही." अब भाभी और दादी के साथ मम्मी भी ठहाको मे शामिल हो गयी थी और शरमाने की बारी मेरी थी.

दादी ने अपनी वसीयत का पत्ता भी खोल दिया. गाव की सारी प्रॉपर्टी, खेत, बगीचे, मकान सब कुछ बाबा ने दादी के नाम कर दिया था. पापा, दादी के अकेले लड़के और मे अपने मम्मी पापा की अकेली. दादी ने सब कुछ मेरे नाम कर दिया था बस शर्त ये थी कि वो मेरी शादी के अगले दिन से मेरा होगा.

उसी दिन, बल्कि उसी समय से मे बडो मे शुमार कर ली गयी.
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उसी रत से ढोलक पे बन्नी बनने के गाने शुरू हो गये और जो सबसे ठनक दार आवाज़ थी वो मेरी दादी की थी. उनके सारे रोग सोक जैसे ढोलक की थापो पे घुल गये. मुझसे पूछा गया कि मुझे कैसा लड़का पसंद है तो मेरे सामने मिल्स आंड बून के कई पात्र घूम गये पर मे क्या बोलती बस शरमा गयी.

मेरी ओर से भाभी बोली, " अरे लड़का ऐसा हो जो लड़की को खुश रखे लेकिन उसके लिए तो अच्छी तरह चेक वेक करना पड़ेगा, देखने से क्या पता चलेगा."

" तो चेक कर लेने ना तुम. आख़िर तुम्हारा नेंदोई होगा तो तेरा भी तो पूरा हक बनता है." मम्मी ने भाभी को छेड़ा.

" अरे कुंडली से कुछ तो अंदाज़ा चल ही जाता है, शुक्र का स्थान देख लेना. किस घर मे है और उच्च स्थान मे है. बात तो ये सही कह रही है असली चीज़ तो वही है तू इसकी चिंता मत कर ये ज़िम्मेदारी अपनी भाभी पे छोड़ दे. एकदम टॅन होगा." दादी भी अब खुल के मज़ाक के मूड मे थी और सब कुछ समझते हुए भी मे अंजान बैठी थी.

उसी दिन से लड़को की तलाश चालू हो गयी.

मे थोड़ा आप सब को अपने परिवार के बारे मे बता दू. इतना तो आप को पता ही चल गया होगा कि मे अपने मा बाप की इकलौती संतान हू. और मेरे पिता भी अपने मा बाप के अकेले लड़के और एक मेरी बुआ. हम लोगो का संबंध गाँव से अच्छी तरह जुड़ा है. जो लोग कहते है ना ओल्ड मनी वो वाली बात है. गाँव मे ढेर सारे खेत के साथ खूब बड़े बड़े काई बगीचे और बड़ा सा घर भी है. गर्मियो की छुट्टियो के अलावा भी साल भर मे दो तीन बार तो हम लोग गाँव मे इकठ्ठा होते ही है. और पापा के जो कज़िन्स है उनेके बच्चे (वैसे हमारे यहाँ कज़िन का कोई कॉन्सेप्ट नही है, जितने मेरे चाचा जी के लड़के लड़किया है वे भाई बहन ही माने जाते है और गाँव मे तो ऐसे भी गाँव की सारी लड़किया ननद और बहुए भाभीया होती है). और उस समय तो बस इतना खुला माहौल होता है..बात बात मे खुले मज़ाक, गालियाँ और उस समय कोई इस बात का ध्यान भी नही देता कि बच्चे भी है आस पास, बल्कि अक्सर जब मम्मी और चाची बुआ को गालियाँ सुनाती थी तो मेरा नाम लेके कि ..कि बुआ पक्की छिनार और बुआ भी जब जवाब देती थी तो ..कि अम्मा बड़ी चुदवासि. और ये सब सिर्फ़ शाब्दिक नही होता था..मुझे अभी तक याद है उस समय मे 9वी मे पढ़ती थी और उस साल होली मे हम सब लोग गाँव मे इकठ्ठा हुए थे. मम्मी और चाची ने मिल के बुआ को ना सिर्फ़ जम के रगड़ा बल्कि उनका पेटिकोट उठा के, अंदर हाथ डाल के..और ब्लाउस तो फाड़ के मुंडेर पे फेंक दिया. मुझे भी गाँव भर की भाभियो ने मिल के ना सिर्फ़ जम के रंग लगाया, खूब खुल के गालियाँ दी बल्कि अंदर हाथ डाल के, उपर नीचे कोई जगह नही छोड़ी. उसी बार हम लोग एक शादी मे भी गये थे, चान्स की बात ये कि मे अकेली बेचारी ननद तो मुझे ही जम के गालियाँ सुनाई गयी.

जब मेने मम्मी से थोड़ा मूह बनाया तो वो बोली, ठीक ही तो है, ननद हो तो गाली तो सुनेनी ही पड़ेगी. मेरा साथ अंत मे चाचा की लड़की ने दिया और मेरी ओर से जम के जवाब दिया. भाभियो ने कहा, अरे बिंनो याद कर ले शादी के बाद काम आएँगे. तो इससे आप सब को अंदाज़ा लग गया होगा कि देसी वेट 4 लेटर वर्ड्स मेरे आस पास के महॉल की भाषा का हिस्सा थे. मम्मी से मेरी बहोत स्पेशल रिलशनशिप थी. उनकी उमर 34-35 की थी, लेकिन वो 25-26 से ज़्यादा की नही लगती थी जैसे आड्स मे कहते है ना कि मा बेटी बहन जैसी लगती है..बस एकदम कयि बार सचमुच धोखा हो जाता था. खूब गोरी, लंबी, इकहरे बदन की लेकिन सीने और हिप्स ज़्यादा..और स्वाभाव तो इतना एक्सट्रॉवर्ट, खूब खुला, बात बात मे मज़ाक, चुहुल और सिर्फ़ जिन से मज़ाक का रिश्ता हो सिर्फ़ उन्ही से नही, बहुओ को भी नही छोड़ती थी. मे उनसे अपनी हर बात खुल के शेर करती थी.मुझे अभी भी याद है जब मेरे पहली बार "वो दिन" हुए थे मे ब्लड देख के एकदम घबडा गयी थी. उन्होने मुझे ने सिर्फ़ सम्हाला, बल्कि खुल के सब चीज़े विस्तार से समझाई भी.

मेरी पहली तीन ब्रा भी उन्होने ही खरीदवाई. फिर उसके बाद भाभी वैसे कहने को तो वे मेरी चचेरी भाभी थी. पर एक तो मेरी कोई और भाभी थी नही और ना उनकी ननद और दूसरे जैसे मेने पहले ही कहा कि हमारी जॉइंट फॅमिली मे सगे चचेरे का कोई मतलब नही था. उमर उनकी 23-24 साल की होगी, 2-3 साल पहले उनकी शादी हुई थी, पर भैया मेरे मारचेंट नेवी मे काम करते थे इसलिए साल के 6 महीने वो बाहर ही रहते थे. करीब 2 साल से वो हमारे साथ ही रहती, खूब खुली, हँसी मज़ाक मे एक्सपर्ट, चहकती, और मेरी तो वो पक्की दोस्त थी. मम्मी के साथ वो मेरी पक्की कॉन्फिडेंट थी. बल्कि अब तो शॉपिंग वही मुझे कराती थी.उन्होने ही मुझे सिखाया कि टी शर्त के नीचे कौन सी ब्रा और टाइट जीन्स के साथ कौन सी पैंटी पहनी जाय, उन्होने मुझे एक तेल भी ला के दिया था, सीने पे लगाने के लिए. और भाभी का मज़ाक सिर्फ़ शब्दो तक नही रहता था बल्कि 'टटोलने , पकड़ने' पर भी आ जाती थी. मम्मी से भी उन की खूब बनती थी. इस के साथ मे मेरी छोटी कज़िन रीमा भी हमारे साथ रहती थी. उसका अभी 15 वा लगा था, और 10 वी मे पढ़ती थी. 8 के बाद गाँव से पढ़ने के लिए आई थी. पापा अक्सर काम से बाहर रहते थे. तो ये था हमारा छोटा सा कुनबा.

लड़के की तलाश मे पहला और सबसे इंपॉर्टेंट स्टेप होता है, लड़की की फोटो खिंचवाना. और उसके लिए भाभी मुझे ले गयी, कोहली स्टूडियो मे. जिसमे फोटो खींचवाए बिना लोग कहते थे अच्छा लड़का मिल ही नही सकता. साड़ी ब्लौज पहन के मेने फोटो खिंचवाई, तो मम्मी बोली वाकई बड़ी लगती है. काई जगह फोटो भेजी गयी, कुंडलिया आई. और इस बार भी दादी की सलाह काम आई. उनकी किसी सहेली की भतीजी का रिश्तेदार, और मम्मी ने भी उन के बारे मे सुन रखा था. सिविल सर्वीसज़ मे उनका सेलेक्षन हुआ था. रंक भी बहोत अच्छी आई थी.पहले तो मम्मी थोड़ी हिचकी, पता नही, उसे मे कैसी लगूंगी, इतनी इंपॉर्टेंट पोस्ट पर है, पता नही उसके लिए कितने किस तरह के रिश्ते आ रहे होंगे. पर मेरी भाभी मेरी तरफ से बोली, अरे मम्मी मेरी ननद कोई ऐसी वैसी थोड़े ही है. एक बार देख लेगा तो देखिएगा, खुद ही पीछे पड़ जाएगा. खैर बात चलाई गयी और दादी की सहेली ने भी बहोत ज़ोर देके कहा लेकिन बात अटकी लड़की देखने पे. लड़की देखने को वो तरीका जिसमे झार मार के लड़के के सारे रिश्तेदार आते है और लड़की ट्रे मे चाय ले के जाती है, मुझे

कतई नही पसंद था. और रीमा तो मुझे चिढ़ाने भी लगी थी कि दीदी चाय की ट्रे ले के प्रॅक्टीस शुरू कर दो.

पता चला लड़के की ट्रैनिंग पहली सेप्टेमबर से मसूरी मे शुरू होने वाली है, इसलिए वो आ नही सकता. और मे भी लड़के को देखने उससे बात चीत कर के ही, 'हा' करने मे इंट्रेस्टेड थी. तय ये हुआ कि सेप्टेंबर के आख़िर मे हम लोग, मे, मम्मी और भाभी मसूरी जाएँगे. पापा को फ़ुर्सत नही थी, लेकिन उनके एक फ्रेंड के परिचित का कुछ कनेक्षन था वहाँ सेवे होटेल मे.

उन्होने वही रुकने का, और बाकी सब इंतज़ाम कर दिया था. भाभी ने लड़के की भाभी से बात करके तय कर लिया था कि वो लोग लड़के को इनफॉर्म कर देंगे और भाभी वहाँ अकॅडमी मे फोन से बात कर के प्रोग्राम तय कर लेगी. यही हुआ. तय ये हुआ कि वो होटेल मे ही आ जाय. मे और भाभी वहाँ रेस्टोरेंट मे बैठे एक कोने मे गप्पे लड़ा रहे थे. बड़ा खूब सूरत मौसम हो रहा था. अभी उसके आने मे थोड़ी देर थी कि हमने देखा कि एक लड़का ब्लू ब्लज़ेर और ग्रे ट्राउज़र्स मे वहाँ आया. और काउंटर पे कुछ पूछने लगा. मे और भाभी टक मार के उसे देखने लगे. हमे लगा कि मसूरी के आस पास ढेर सारे बोरडिंग स्कूल है, उन्ही मे किसी स्कूल मे पढ़ने वाला कोई लड़का होगा. गोरा, खूब लंबा, हल्की हल्की मुच्छे. ऐसे लड़को के लिए मेरे और भाभी के बीच एक कोड नेम था, 'रसगुल्ला'. मेने भाभी को चिड़ाया, क्यो भाभी रसगुल्ला कैसा है. वो बोली बहुत बढ़िया, एक बार मे पूरा गप्प कर लेने लायक, लेकिन अब तू रसगुल्ले का चक्कर छोड़ दे अभी आता होगा तेरा वो मोटा चम चम खिलाएगा. अभी हम लोगों मे किसी ने उसकी फोटो भी नही देख रखी थी, मेरे मन मे जो इमेज थी कि थोड़ा स्टॉट सा, पढ़ते पढ़ते चश्मा लग गया होगा. उसे पढ़ाई के अलावा और कुछ अच्छा नही लगता होगा, डल, नर्ड. थी तक वो रसगुल्ला हमारे टेबल के ही पास आने लगा. मेने भाभी को चिढ़ाया, भाभी देख, आपको देख के सीधे आ रहा है. वो बोली अरे नही यार तेरे को देख के, लेकिन बेचारा उसे क्या मालूम कि इस पे पहले से रिज़र्व्ड का बोर्ड लग चुका है.

वो सीधे हम लोगो के टेबल पे ही आ गया और बोला, " मे राजीव, आप लोग शायद मेरा ही इंतजार कर रहे थे."

क्रमशः...............................
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शादी सुहागरात और हनीमून--2

गतान्क से आगे…………………………………..

चौंक के हम लोगों की हालत खराब हो गयी. पहले तो हम दोनो खड़े हो गये, फिर बैठ गये. मे तो तैयार भी नही थी 'दिखने' के लिए. भाभी ने किसी तरह बात समहालते हुए कहा, " लेकिन आप तो डेढ़ दो घंटे बाद.. और आप?.. आप को ढूँढने मे कोई दिक्कत तो नही हुई?"

" नही, जब आप का फोन आया तो मेने यही सोचा था लेकिन फिर सोचा कि यहाँ बैठ के क्या करूँगा चलु आप लोगो के पास ही. और रिसेप्षन मे आपका रूम नंबर तो बता दिया था लेकिन फिर उसने ये भी बोला कि आप दोनो थोड़ी देर पहले यही आई थी तो मेने सोचा देख लू" और फिर मुझे देखते हुए बोला,

"और आपकी फोटो तो मेने देख ही रखी थी."

शर्मा के मेने सर झुका लिया. बस मन कर रहा था कि धरती फॅट जाय.. ये क्या तरीका हुआ.. कि टाइम के पहले और वो हम लोगो के बारे मे क्या सोचेगा. शायद मेरी परेशानी उसने भाँप ली थी. बात बदलते हुए उसने भाभी से पूछा,

" क्या आप मसूरी पहली बार आई है.."

" हां मे तो पहली बार आई हू, लेकिन ये आ चुकी है. ये दो साल दून मे बोरडिंग मे पढ़ती थी." भाभी ने बात संभाली.

" चलिए अंदर कमरे मे चलते हैं." भाभी ने दावत दी और मुझसे कहा कि अंदर जाके मम्मी को बोल दू कि राजीव आ गये हैं.

मेरी तो जैसे जान मे जान लौटी. हिरण जैसे जाल से छूटी, मे सरपट भागी सूयीट मे. मम्मी को बता के अंदर के कमरे मे घुस कर पलंग पे औंधे मूह लेट गयी. तरह तरह के ख़याल... वो क्या सोचेंगे, मे अभी तैयार भी नही थी तब तक भाभी और उनकी आवाज़ सुनाई दी. लेकिन मे कमरे से बाहर नही आई. भाभी ने रूम सर्विस को ऑर्डर दे दिया था. थोड़ी देर मे बात के साथ क़हक़हे, खिलखिलाने की आवाज़ आई

कुछ देर मे भाभी अंदर आई और मेरी चोटिया पकड़ के उन्होने खींचा और कहा, " हे, राजीव घूमने चलने के लिए कह रहे है. तैयार हो जाओ." मेने आना कानी की तो भाभी ने चिढ़ा चिढ़ा के मेरी हालत खराब कर दी. पहले मम्मी ने दिखाने के लिए साड़ी तय कर रखी थी, लेकिन अब देख तो उन्होने लिया ही था. तो भाभी ने कहा कि सलवार सूट पहन लो और आँख नचा के बोली हां दुपट्टा गले से चिपका कर रखना, ज़रा भी नीचे नही. मसूरी मे आ के अगर पहाड़ नही देखे तो मेने भाभी की सलाह मान ली सिवाय दुपट्टे के. उफफफ्फ़ मेने आप को अपने बारे मे तो बताया ही नही कि उस समय मे कैसी लगती थी.

सुर्रु के पेड़ सी लंबी, पतली, 5-7 की. पर इतनी पतली भी नही, स्लेंडरर आंड फुल हाफ कवर्स. गोरी. बड़ी बड़ी आँखे, खूब मोटे और लंबे बालों की चोटी, पतली लंबी गर्दन और मेरे उभर 34सी, (अपनी क्लास की लड़कियों मे सबसे ज़्यादा विकसित मे लगती थी और इसी लिए पिछली बार मुझे होली पे 'बिग बी' का टाइटल मिला था), मेरी पतली कमर और स्लेन्डर बॉडी फ्रेम पे बूब काफ़ी उभरे लगते थे, और वही हालत हिप्स की भी थी, भरे भरे.

भाभी ने मेरा हल्का सा मेकप भी किया, हल्का सा काजल, हल्की गुलाबी लिपस्टिक और थोड़ा सा रूज हाइ चीकबोन्स पे. एक बार तो शीशे मे देख के मे खुद शर्मा गयी. बाहर निकली तो राजीव ने अपनी बातों से मम्मी और भाभी दोनो को बंद रखा था. टेंपो से हम लोग लाइब्ररी पॉइंट तक पहुँचे होंगे कि मम्मी ने कहा कि उनके पैरों मे थोड़ी मोच सी आ गयी है और वो होटेल वापस जाएँगी. भाभी ने भी कहा कि वो मम्मी को छ्चोड़ आएँगी. हम लोग भी वापस होना चाहते थे पर उन दोनो ने मना कर दिया. मे मम्मी की ट्रिक साफ साफ समझ गयी पर वो लोग थोड़ी ही दूर गयी होंगी कि भाभी ने मुझे वापस बुलाया और अपने हाथ से मेरे दुपट्टे को गले से चिपका के सेट कर दिया..और गाल पे कस के चिकोटी काट के बोला, "अब अगर तूने इसे ठीक करने की कोशिश की ना तो और मुस्करा के बोली, जा मज़े कर".

लाइब्ररी पॉइंट के पास एक दुकान थी. हम लोग उसके पास खड़े थे और उन लोगो को जाते हुए देख रहे थे. जैसे ही वो लोग आँखो से ओझल हुए, उन्होने पूछा, " हे तुम्हे, जलेबी कैसी लगती है?"

" अच्छी, क्यों" मुस्कराते हुए मे बोली..

" मुझे भी बहोत अच्छी लगती है, और इस दुकान की तो बहोत फेमस है चलो खाते है" और हम दोनो उस दुकान मे घुस गये.

मे मसूरी आने के पहले से सोच रही थी क्या बात करूँगी कैसे बोलूँगी लेकिन जब आज मौका पड़ा तो उन्होने इतने सहज तरीके से मुझे लगता था वो तो अपने बारे मे ही बाते करते रहेंगे पर उन्होने मुझसे इस तरह कुछ कहा कि.. मे ही सब कुछ बोलती चली गयी और अपने बारे मे सब कुछ बता दिया. मुझे क्या अच्छा लगता है, स्कूल और घर के बारे मे.. और बाते करते करते हम दोनो दो तीन प्लेट जलेबी गटक गये.
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08-17-2018, 02:31 PM,
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माल रोड पे हम थोड़े ही दूर गये होंगे कि सड़क से घाटी का बहोत अच्छा सीन नज़र आ रहा था. हम दोनो वही जा के रेलिंग पकड़ के खड़े हो गये और नीचे का नज़ारा देखने लगे. पहाड़ो से नीचे उतरते बादल, घाटियो मे तैरते, सूरमे, सफेद, रूई के गोलो जैसे और तभी जैसे ग़लती से उनका हाथ मेरे हाथ से छू गया और मुझे जैसे करेंट लग गया हो. मेने झटके से हाथ हटा लिया. उसी समय एक बादल का फाहे जैसा टुकड़ा आके मेरे नरम नरम गालो को छू गया. मुझे इतना अच्छा लगा जैसे मेने उनकी ओर निगाह की तो अचानक देखा कि उनकी निगाह चोरी चोरी मेरे उभारो पे चिपकी है. उन्होने तुरंत अपनी निगाह हटा ली जैसे कोई शरारती बच्चा शरारत करते पकड़ा जाय और मे मुस्करा पड़ी और मुझे मुस्कराते देख के वो भी हंस पड़े और बोले, अभी बहोत कुछ देखना है चलो. और हम लोग चल दिए. खूब भीड़ थी, लेकिन हम लोग अपनी मस्ती मे बस चले जा रहे थे. तभी एक मोमोज़ की दुकान दिखी. अबके मेने उनसे कहा और हम लोग अंदर चल के बैठ गये. मेने उनसे पूछा की कौन से मोमो लेंगे, तो वो बोले कि मे नों-वेज नही ख़ाता, लेकिन तुम लेलो. मेने कहा कि नही मोमो मुझे भी वेज ही अच्छे लगते है, लेकिन क्या रिलिजियस रीज़न से या किसी और कारण से वो पूरे वेज है तो पता चला कि कुछ एक दो बार उन्होने नोन-वेज खाया था लेकिन बस ऐसे ही छोड़ दिया और उनके घर मे भी लोग नही खाते. बात बदलकर अब मेने उनसे स्पोर्ट्स के बारे मे और उनके इंट्रेस्ट्स के बारे मे बात शुरू की तो पता चला कि वो क्रिकेट खेलते है और ऑल राउनदर है, नई बॉल से बोलिंग करते है.. ( वो इन्होने वैसे कहा कि जैसे बस थोड़ा बहुत, पर बाद मे उनकी भाभी से पता चला कि वो अंडर 19 मे अपने स्टेट की ओर से खेल चुके है), उन्हे फोटोग्रफी का भी शौक है और स्विम्मिंग भी. पढ़ना भी उनकी हॉबी है. मे एक दम चहक उठी क्यो कि वो मेरी भी हॉबी थी. मेने भी बताया कि थोड़ी बहोत स्विम्मिंग मे भी कर लेती हू. और मुझे वेस्टर्न ड्रेस, डॅन्स, म्यूज़िक और मस्ती करने मे बहोत मज़ा आता है. तब तक हम लोग बाहर निकल चुके थे. कुलड़ी तक हम लोगो ने दो चक्कर लगाया होगा. लौट ते हुए उन्होने कहा कि चलो आइस्क्रीम खाते है. ठंडक मे आइस्क्रीम खाने का मज़ा ही कुछ और है. हम लोगो ने सॉफ्टी ले ली. वही सामने ही केम रेस्टौरेंट था. वहाँ एक बोर्ड लगा था क़ब्ररे का. मेने आँखे नचा के चिढ़ाते हुए पूछा, " क्यो अभी तक देखा कि नही?"

" नही, लेकिन देखने का इरादा है, क्यों, तुम्हे तो नही बुरा लगता, कोई पाबंदी."

" एकदम नही, बल्कि मे तो कहती हू एकदम देखना चाहिए. जहा तक पाबंदी का सवाल है, मे सिर्फ़ पाबंदी पे पाबंदी लगाने की कायल हू." वो खूब ज़ोर से हँसे और मेने भी हँसने मे उनका साथ दिया. हम दोनो इस तरह टहल रहे थे, जैसे बहोत पुराने दोस्त हो. तभी एक किताब की दुकान दिखी और हम दोनो अंदर घुस लिए. मे किताब देख रही थी और वो भी. जब हम दोनो बाहर निकले तो इनके हाथ मे एक पॅकेट था, किताब का. मेने उसे खोलना चाहा तो वो बोले नही होटेल मे जाके खोलना.

शाम होने वाली थी. लौट ते हुए घाटी का द्रिश्य और रोमॅंटिक हो रहा था. हम दोनो वही, जहाँ पहले जाके खड़े थे, रेलिंग पकड़ के खड़े होगये. बहोत ही खूबसूरत सा एक इंद्रधनुष घाटी मे बन रहा था. हम दोनो सॅट के खड़े थे.

वो बोले, " तुम्हे मालूम है, लोग कहते है इंद्रधनुष को देख के कुछ माँगो तो ज़रूर मिलता है. चलो माँगते है."

" एकदम" मुस्कारके मे बोली और इंद्रधनुष की ओर देख के आँखे बंद कर ली. मेने महसूस किया कि उनका हाथ मेरे हाथ को छू रहा है लेकिन अबकी बार मेने हाथ नही हटाया. उनका स्पर्श बस लग रहा था जैसे वो इंद्रा धनुष पिघल के मेरी देह मे घुल गया हो. मेरे साँसे, धड़कन तेज हो गयी. थी तब मेने उनका हाथ अपने हाथ पे महसूस किया. मुझे लगा जैसे मेरा सीना पत्थर की तरह सख़्त हो गया हो. मेने आँखे खोली तो देखा कि वो एकटक मेरी ओर देख रहे थे. शर्मा के मेने नज़र झुका ली और कहा,

" माँगा अपने?"

" हाँ और तुमने", मुस्कराकर बिना मेरा हाथ छोड़े वो बोले.

" हाँ" ब्लश करते हुए मेने कहा जैसे उन्हे मालूम चल गया हो कि मेने उन्ही को माँगा. मेरी ओर देख के वो बोले,

" मेरा बस चले तो इस इंद्रधनुष को तुम्हारे गले मे पहना दू."

" धत्त, अभ चलिए भी. ज़्यादा रोमॅंटिक ना बानिए. देर हो रही है. वहाँ मम्मी, भाभी इंतजार कर रही होंगी.

और सच मे वो लग इंतजार कर रहे थे. मम्मी तो बहोत बेचैन हो रही थी लेकिन उनकी बेचैनी ये थी कि राजीव ने मुझे पसंद किया कि नही.

मम्मी पानी वानी लेने के लिए अंदर गयी तो भाभी ने मुस्करा के, अपनी बड़ी बड़ी आँखे नचा के उनसे पूछा,

" तो क्या क्या देखा आप ने और पसंद आया कि नही"

"भाभी, हिल स्टेशन पे जो देखने को होता है वही, पहाड़ और घटियाँ, और दोनो ही बहोत खूबसूरत "

उनकी बात काट के मेरे उभरे उभारो को घूरते हुए, भाभी ने चुटकी ली, " पहाड़ तो ठीक है लेकिन आपने घाटी भी देख ली?" मेरी जाँघो के बीच मे अर्थ पूर्ण ढंग से देखते हुए वो मुस्काराईं. उनकी बात का मतलब समझ के अपने आप मेरी जंघे सिकुड गयी. लेकिन राजीव चुप रहने वाले नही थे. भाभी बहोत ही लो कट ब्लाउस पहनती थी जिसमे उनका गहरा क्लीवेज एकदम सॉफ दिखता था और आज तो उनका आँचल कुछ ज़्यादा ही धलक रहा था.

उनके दीर्घ उरोजो को देखते हुए वो बोले, " भाभी जहाँ इतने बड़े बड़े पहाड़ होंगे वहाँ उनके बीच की घाटी तो दिखेगी ही."

" अरे पहले इन छोटे छोटे पहाड़ो पे चढ़ लो फिर बड़े पहाड़ो पे नंबर लगाना." अब भाभी ने खुल के मेरे दुपट्टे से बिना ढके उरोजो की ओर इशारा करते हुए कहा. शर्मा के मे गुलाबी हो गयी और उठ के अपने कमरे की ओर चल दी. थी तब मेने सुना राजीव भाभी से कह रहे थे,

" एक दम भाभी. लेकिन फिर भूलिएगा नही," सेर को सवा सेर मिल गया था. अंदर पहुँची तो मेरा सीना धक धक हो रहा था. मेरे गाल दहक रहे थे. जब मे वॉश बेसिन के सामने पहुँची तो मेरा चेहरा धक से रह गया. दुपट्टा मेरे गले से चिपका था और मेरे दोनो उरोज खूब उठे साफ साफ दिख रहे थे. तभी तो वो और भाभी इस तरह से पहाड़ का नाम ले ले के मज़ाक कर रहे थे. बाहर ज़ोर ज़ोर से हँसने की, उनकी, मम्मी और भाभी की आवाज़ आराही थी. मेने सोचा कि दुपट्टा ठीक कर लू पर कुछ सोच के मेने 'उंह' किया और मुस्कराते हुए बाहर निकल गयी. उन लोगो मे किसी बात पे मतभेद चल रहा था. बात ये थी कि, मम्मी उन को रात के खाने पे बुला रही थी और वो हम लोगो को अकॅडमी ले चलने की ज़िद कर रहे थे. मेने थोड़ी देर सुना और फिर बीच बचाव करते हुए फ़ैसला सुना दिया कि हम लोग अकॅडमी चल चलते है और वो रात का खाने हम लोगों के साथ ही खा लेंगे. वो झट से मान गये. भाभी ने उन्हे चिड़ाया कि अभी से ये हालत है, मेरे कहते ही झट से मान गये अब शरमाने की उनकी बारी थी.

उनके जाने के कुछ देर बाद हम लोगो को अकॅडमी के गेट पे पहुँचना था, जहा वो मिलते. शेवोय के पास मे ही था.

उनके जाते ही मम्मी से नही रहा गया. वो मुझसे पूछने लगी, " बोल क्या बात हुई. तुझे पसंद किया या नही. तूने कुछ पूछा, शादी के लिए राज़ी है ना."

" मम्मी बाते तो बहोत हुई लेकिन, ये मेने नही पूछा." मे बोली.

" तू रहेगी बुद्धू की बुद्धू इतने अच्छा लड़का अगर हाथ से निकल गया ना" मम्मी के चेहरे पे परेशानी के भाव थे.

" अरे आप यू ही परेशान हो रही है. मेरी इस प्यारी ननद को कौन मना कर सकता है" भाभी ने मेरे गाल पे चिकोटी काट ते हुए कहा.

क्रमशः…………………………
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08-17-2018, 02:31 PM,
#5
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--3

गतान्क से आगे…………………………………..

जब हम गेट पे पहुँचे तो वो इंतजार कर रहे थे. एल.बी.एस.ए.एन.ए. (लाल बहादुर शास्त्री अकॅडमी ऑफ नीशनल आड्मिनिस्ट्रेशन) का नाम तो मेने पहले भी सुन रखा था. बड़ा सा गेट, एक रास्ता उपर की ओर जाता था जो उन्होने बताया कि कंपनी बाग की ओर जाता है. वो हम लोगो को लाउंज मे लेगये. सारा स्ट्रक्चर वुडन, ( कुछ सालो बाद आग से वो सारा कुछ नष्ट हो गया, उसकी जगह सेमेंट की अच्छी बिल्डिंग बनी पर वो बात नही) इतना अच्छा लगता था और वहाँ खिड़की से बाहर पहाड़ो की चोटिया, नीचे दूर तक तन कर खड़े देवदार के पेड़ और मौसम साफ हो गया था इसलिए कुछ पे हल्की बर्फ बस मन कर रहा था कि देखते ही रहो राजीव बगल मे खड़े थे उनके पास मे होने से ही एक अजब सा अहसास बदन मे सिहरन भी थी और बदन दहक भी रहा था. उन्होने मुझसे कहा कि, "तुम्हे किताबो का शौक है चलो तुम्हे लाइब्ररी दिखा के लाते है". मम्मी और भाभी बोली कि, "तुम लोग देख आओ हम लोग यही बैठते है". लाइब्ररी बेसमेंट मे थी. उतरते हुए मे थोड़ा लड़खड़ाई और राजीव ने कस के पकड़ लिया. मेरे पूरे बदन मे एक सिहरन सी दौड़ गयी.

अंदर चारो ओर किताबे ही किताबे, नॉवेल, आर्ट कविता हर तरह की किताबे . लौट ते हुए मेने देखा कि काउंटर पे एक खूब गोरी पर्वत बाला, गोरे बल्कि दहक्ते गाल. दो तीन प्रोबेशनेर उससे लसे हुए थे.

मेने हंस के कहा, " इस किताब के पढ़ने वाले भी काफ़ी लगते है."

" हाँ काफ़ी लंबी लिस्ट है". हंस के वो बोले.

" कही आप का नंबर तो इस की वेटिंग लिस्ट मे तो नही" मेने छेड़ा.

" यूह्यूम, मेरी किताब मुझे मिल गयी है" हंस के मुझे देख के वो बोले. एक अजब सी शरारत भरी चमक उनकी आँखो मे थी.

मे झट से दौड़ के सीढ़ियो से उपर चढ़ गयी, खिलखिलाती, हँसती, जैसे बादलो को हटा के कच्ची धूप नीचे आँगन मे उतर आई. लाउंज से फिर वो हम लोगो को हॉस्टिल, ऑडिटोरियम हर जगह ले गये. चारो ओर पाइन के पेड़, हरियाली और खरगोश, तैरते बादल के टुकड़े. पूरी पहाड़ी उतर के हम लोग हॉस्टिल तक पहुँचे. वही पर एक बड़ा सा मैदान था जिसमे हॉर्स राइडिंग के लिए लड़के लड़किया जा रहे थे. एक पगडंडी के रास्ते से हम लोग उपर आए. दूर कुछ झोपडे से दिख रहे थे. मेने पूछा और वहाँ क्या मिलता है.

हल्के से वो बोले, " वहाँ तिब्बती छन्ग मिलती है"

" अपने कभी पिया क्या" भाभी ने चिड़ाया.

" कोई मिला नही पिलाने वाला"

" वाला या वाली" भाभी कहाँ चुप रहने वाली थी

" वही समझ लीजिए" भाभी ने मेरे कान मे कहा कि मे उन्हे रात मे रुकने के लिए पटा लू. मे कैसे कहती, अजब पशोपश मे थी. लेकिन जब वो गेट पे हम लोगो को छोड़ रहे थे तो उन्होने बोला कि उनकी कोई ऑफिसर्स क्लब की मीटिंग है जिसके वो सेक्रेटरी है इसलिए वो थोड़ी देर से आएँगे. मे बोल पड़ी कि रात को हम लोगो के साथ रुकिएगा तो हम लोग बाते करेंगे और फिर कल हम लोगो को केमप्टी फाल भी चलना है. वो एक पल तो मुझे देखते रहे और फिर मुस्करा के बोले ठीक है.

भाभी रास्ते भर मुझे चिढ़ाती रही. लेकिन होटेल पहुँचते ही मम्मी पे फिर वही परेशानी का दौरा पड़ गया. पता नही उन्हे मे पसंद आई कि नही, और फिर उसने अपने घर वालो को क्या बताया.

भाभी लाख कहती रही लेकिन वो नही मानी. आख़िर भाभी नीचे होटेल मे गयी उनकी भाभी को फोन करने. तय ये हुआ था कि हम लोगो से मिलने के बाद उनकी भाभी उनसे फोन कर के हम लोगो को बताएगी कि क्या हुआ. मम्मी एक दम साँसे बाँधे इंतजार करती रही.

भाभी लौट के आई तो बस मुस्करा रही थी. उनकी आँखों मे खुशी नाच रही थी. बस उन्होने कस के मुझे बाहों मे भर लिया और लगी चूमने गालों पे, होंठों पे. और फिर कस कस के मेरे उभार दबाती मसल के बोली, अब इनको दबाने रगड़ने का पूरा इंतेजाम हो गया. भाभी इतने पे भी नही रुकी और उन का एक हाथ सीधे मेरी शलवार के उपर से जाँघो के बीच जा के 'वहाँ' भीच लिया और वो हंस के कहने लगी "और इस बुलबुल के चारे का भी."

उन्होने इस बात का ध्यान भी नही किया कि मम्मी बगल मे खड़ी है. "अरे मुझे तो बताओ क्या हुआ क्या कहा", मम्मी बेसबर हो के बोली.

अब भाभी ने मुझे छोड़ के मम्मी को पकड़ लिया और बोली, " बधाई हो, लड़के ने हां कर दी और वो शादी के लिए जल्दी भी कर रहा है. उसे ये पसंद ही नही बल्कि उसकी भाभी तो कह रही थी कि फिदा हो गया है".

मम्मी ने खुश हो के तुरंत मेरी बालाएँ ली. सारे पीर, देव याद किए और खुशी मे मुझे अपनी बाहों मे भर लिया. मेरे माथे, गाल पे कस के चूमने लगी. फिर भाभी से कहा ज़रा पता करो आस पास कोई मंदिर हो तो अभी दर्शन कर आए. हम सब बाहर निकले और मम्मी ने होटेल से ही पापा को, दादी को सबको ये खुश खबरी दी. दादी से तो उन्होने ये भी कहा कि ये ईश्वर की कृपा है कि दादी ने ऐसी बात कही और इतनी जल्दी इतने अच्छा लड़का मिल गया. राजीव की तारीफ करके वो अगा नही रही थी.

मंदिर से लौट के भाभी फिर चालू हो गयी. मम्मी से, वो मुझे चिढ़ाते हुए बोली, " कुंडली कैसी मिली थी और वो शुक्र"

" अरे चौदह गुण मिले थे और शुक्र भी काफ़ी उँचे घर मे था." मम्मी भी मुस्करा रही थी.

" अरे तब तो तेरी अच्छी मुसीबत होगी, रोज कस के रगड़ाई करेगा वो." मेरे गालो पे कस के चिकोटी काट के भाभी ने छेड़ा.

" धत्त" मे शर्मा गयी. मे बार बार दरवाजे की ओर देख रही थी. भाभी ने मेरी चोरी पकड़ ली.

" अरे किस बात का इंतजार हो रहा है उसके आने का या साथ साथ सोने का."

भाभी मुस्करा के बोली " आप ही सोइएगा साथ" मे मूह फूला के बोली.

" अरे सोने के लिए तुमने बुलाया है तो तुम्हे ही साथ सोने होगा. और फिर घबराती क्यो हो कुछ दिनो की ही तो बात है, शादी के बाद तो साथ सोना ही होगा और सोना क्यों वोना भी होगा." भाभी ने जिस तरह से मूह बनाया हम सब को मालूम हो गया कि वो क्या कह रही थी."

मेने शर्मा के सिर नीचे कर लिया. भाभी तो इस से भी ज़्यादा बोलती थी, पर मम्मी के सामने.. इस तरह. भाभी फिर चालू हो गयी, " अरी बिन्नो, मन मन भावे मूड हिलावे मन तो कर रहा होगा कि कितनी जल्दी मिले और गपक कर लू. वैसे एक मिनिट नही छोड़ेगा तुझे. चढ़ा रहेगा.. शरमाती क्यो है शादी तो होती इसीलिए है."

" मम्मी, देखिए भाभी को बहोत तंग कर रही है. " मेने शिकायत लगाई. मम्मी की हँसी दब नही पा रही थी. वो कमरे मे जा रही थी वही दरवाजे पे ठहर के, भाभी का ही साथ लेती, बोली, " अर्रे ठीक तो कह रही है वो, क्या ग़लत कह रही है..और अगर मेरी ननद होती ना तो मे सिर्फ़ बात से थोड़े ही छोड़ती" अब क्या था भाभी को तो और छूट मिल गयी.

वो मेरी ओर बढ़ी और खुल के बोली, " ननद रानी, अभी नखरे दिखा रही हो. सुहाग रात की अगली सुबह पूछूंगी कितनी बार चुदवाया कितनी बार मूसल घोंटा. चलो ज़रा अभी चेक वेक्क कर लू तुम्हारी सोन चिड़िया"

मे बच के थोड़ा दूर हट गयी और तकिया खींच के भाभी को मारा. भाभी तो बगल हट के बच गयी पर तकिया कॅच हो गया. राजीव उसी समय दरवाजे के अंदर से घुसे थे और वो उनके उपर पड़ा. उन्होने झटक से कॅच कर लिया. " कॅच करने मे बड़े एक्सपर्ट हैं आप." मे बात बनाने के लिए बोली.

" और क्या, तभी तो तुम्हे कॅच कर लिया." भाभी कहाँ चुप रहने वाली थी.
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#6
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
तब तक मम्मी कमरे से निकल आई और हम लोग नीचे रेस्टौरेंट मे खाने के लिए उतरने लगे, वो और मम्मी आगे आगे और मे और भाभी पीछे पीछे. भाभी साइड से मेरे बूब्स के उभार छू के धीरे से बोली, इसे कॅच किया था कि नही. खाने की टेबल पे ज़्यादा बात तो वो मम्मी और भाभी के साथ कर रहे थे पर उनकी निगाहे चुपके चुपके मुझसे ही बतिया रही थी, और एक दो बार टेबल के नीचे से जाने अंजाने उनका पैर भी और मैं सिहरन से भर जाती.

खाने के बाद भाभी, मे और वो देर तक बाते करते रहे. हम लोगो का दो कमरों का सूयीट था. मम्मी अपने कमरे मे सोने चली गयी. मे और भाभी उनसे बाते करते रहे. और भाभी को मान गयी मे, छेड़ते मज़ाक करते, उन्होने उनके बारे मे, उनके घर वालो के बारे मे ढेर सारी बाते पूछ ली. अगले दिन के लिए तय हुआ था कि कॅंप-टी फॉल जाएँगे. उन्होने बताया कि एक छोटा सा ट्रेक भी है और उससे कम समय मे पहुँच सकते है. मे तो मचल गयी कि मेने बहोत दिनों से ट्रेकिंग नही की है, ट्रेक से ही चलेंगे. वो तो झट मान गये, लेकिन मम्मी का सवाल था, इसलिए तय हुआ कि वो भाभी के साथ कार से आएँगी और हम दोनो ट्रेक से.

बगल के कनेक्टिंग रूम मे जब हम उन्हे छोड़ने गये तो भाभी ने फिर छेड़ा अरे कम से कम गुड नाइट किस तो दे दे. मे शर्मा के भाग के अपने कमरे मे चली आई. मुझे लगा कि वो क्या सोचेंगे. तभी मेरे नज़र उस पॅकेट पे पड़ी जो उन्होने मुझे दिन मे किताब की दुकान से निकलते समय गिफ्ट की थी. उसे खोला तो अंदर एक इंग्लीश की कविताओ की किताब थी, पर तभी मुझे उसमे एक कार्ड सा नज़र आया. उसे निकाला तो उसपर बहोत सुंदर हॅंड राइटिंग मे लिखा था, 'लिखने बैठी ज़की सबी, गाही गाही गरब गरूर, भाए ने केते जगत के, चतुर चितेरे कूर.'

तभी भाभी के आने के आहट हुई तो मेने झट से किताब वापस पॅकेट मे डाल दिया. लेकिन भाभी ने देख लिया और उसे उठा के बोली, " देखें तेरे उसने क्या गिफ्ट दिया है. कौन सी किताब है, काम सुत्र या प्रेम पत्रो की." जब उन्होने कविता की किताब देखी तो पूछा, "इसके अंदर फूल वुल था क्या.." मे अब क्या छिपाती. मेने कहा, "नही लेकिन एक कार्ड ज़रूर था लेकिन उस पर जो लिखा था वो मेरी समझ मे नही आया."

वो बोली दिखा. भाभी ह.ई.न.द.ई मे म.आ. थी और खास कर श्रीनगर साहित्य मे उनको काफ़ी महारत थी. एक दो बार उन्होने पढ़ा और मुस्करा के बोली, " तेरा वो बड़ा रोमॅंटिक है और रसिक भी. बड़ी तगड़ी तारीफ की है उसने तेरे रूप की. लगता है दीवाना हो गया है तेरे उपर."

" भाभी पहले मतलब बताइए ना," मेने बड़े नखरे से पूछा.

" मतलब है कि नायिका का चित्र बनाने के लिए बड़े बड़े चित्रकार गर्व के साथ इकठ्ठा हुए लेकिन उसका रूप इतना था कि कोई भी चित्र उसके रूप और लावण्य की बराबरी नही कर सका. कितनी तारीफ की है उसने. मे होती तो एक चुम्मि तो दे ही देती बिचारे को."

" दे दीजिए ना बिचारे को मुझे कोई ऐतराज नही होगा." अब मेरी चिढ़ाने की बारी थी.

" अच्छा बताती हूँ तुम्हे कि उसे क्या क्या और कैसे देना है लेकिन आज मुझे सोने की जल्दी है, सुबह जल्दी उठना है. कल रात मे बताउन्गि तुझे, ट्रेन मे" और वो बत्ती बुझा के करवट बदल के सो गयी पर मुझे नींद कहा. आँखो मे बार बार राजीव की सूरत तैरती. इतना कठिन एग्ज़ॅम पास किया लेकिन कितना सिंपल और भाभी की बात भी, दूसरा कोई लड़का होता तो दस चक्कर दौड़ाता सच मे अगर वो एक बार अगर माँगे ना तो मे दे ही दू कम से कम एक चुम्मि. शादी की बात तो अब तय ही हो गयी है.

थोड़ी देर मे जब मुझसे नही रहा गया तो साइड लॅंप जला के वो कविता की किताब खोल ली पहली ही कविता शेक्स्पियर का एक लव सोनेट थी,

शल आइ कनपेर थी टू आ सम्मर्स डे, थौ आर मोर लव्ली आंड टेम्परेट

मे पढ़ कविता रही थी लेकिन लग रहा था जैसे वो मेरे बगल मे बैठा हो और सुना रहा हो और मे अपने कानो की अंजलि बना के एक एक शब्द रोप रही हू. तभी मेने ध्यान दिया कि कुछ लेटर्स अंडारलिनेड है, हल्के से और जब मेने उन्हे मिला के पढ़ा तो लिखा था, 'यू आर स्पेशल आइ लव यू'. मेरी साँस थम गयी. किताब सीने पे दबा बस मे सोचती रही और वैसे ही सो गयी.

सुबह नींद खुली तो थोड़ी देर हो चुकी थी. भाभी कभी की उठ चुकी थी और मम्मी के पास बैठी थी. उन्होने ध्यान नही दिया कि मे कमरे मे घुस चुकी हू. वो उंगली के इशारे से बता रही थी, इत्ता बड़ा और दोनो खिलखिला के हंस दी मेने बड़े भोलेपन से पूछा, " क्या भाभी ..किसका कितना?" मम्मी ने आँख तरेर के मना किया पर भाभी तो भाभी थी.

" तेरे उसका बता रही थी तंबू कितने तना था. अरे बुद्धू, छोटा होता है या बड़ा होता है, सुबह सुबह सबका खड़ा होता है. सुबह सुबह मे इसी लिए खुद बेड टी लेके गयी थी कि देखु की तंबू कितना तना है"

" तंबू या उसका बंबू" मेरे उपर भी भाभी का असर आ गया था.

" अरे मे तो तंबू देख के आई हू. बंबू तू जाके देख, तेरा ही तो है. आँखों से देख, छू के देख, पकड़ के देख, लेकिन ये मे बता रही हू बिन्नो, खुन्टा जबरदस्त है. फॅट जाएगी तेरी अच्छी तरह तैयारी करनी पड़ेगी तुझे कुश्ती की."

" मम्मी देखिए भाभी कैसी चिढ़ाती रहती है" मेने कस के शिकायत की.

" क्यों चिढ़ती हो. अरे भाभी हो तो उसे ज़रा समझाओ, तैयारी कर्वाओ." भाभी को डाँटने के बहाने वो भी मज़ाक मे शामिल हो गयी. मे बनावटी गुस्सा दिखा के तैयार होने के लिए कमरे मे मूड गयी.

ट्रेकिंग पे जाना था इसीलिए मेने सोचा कि जीन्स पहनु पर मुझे लगा कि कही मम्मी लेकिन भाभी ने कहा कि मे जीन्स टी शर्ट ही पहनु और वो मम्मी को पटा लेंगी. उन्होने मेरी एक सफेद टी शर्ट निकाल भी दी और उसके साथ ब्रा भी. ब्रा बड़ी वैसी थी पर भाभी ने डाँट के मुझे पहनाया, हाफ कप, लेसी, थोड़ी नीचे से पॅडेड और पुश अप. उससे मेरे तीन बूब्स ना सिर्फ़ और उभरे लग रहे थे बल्कि क्लीवेज भी और गहरा. फिर कल की तरह हल्का सा मेकप भी. टी शर्ट मेने बाहर निकाल के रखी थी पर भाभी ने अपने हाथ से मेरी जीन्स की बटन खोल के उसे अंदर तक कर दिया और बेल्ट कस के मेरी पतली कमर पे बाँध दी. जब मेने हल्के से झुक के देखा तो मेरे किशोर उरोज एकदम साफ साफ, मे कुछ करती उसके पहले उन्होने मुझे धक्का दे के कमरे से बाहर कर दिया. राजीव वहाँ पहले से ही मेरा इंतजार कर रहे थे. टी शर्ट और जीन्स मे वो बहोत हंडसॉम लग रहे थे. एकदम 'वी' की तरह का शेप, चौड़ी छाती और पतली सी कमर, मे कुछ बोलती उसके पहले ही भाभी ने कहा कि तुम लोग चलो. मम्मी अभी पूजा कर रही है उन्हे टाइम लगेगा. फिर हम लोगो को मंदिर जाना है और थोड़ी शॉपिंग करनी है. ड्राइवर को मालूम है, हम लोग पहुँच जाएँगे और लंच भी वही करेंगे.

आज मुझे भी बहोत मस्ती छा रही थी. थोड़ी ही देर मे सड़क से उतर के जैसे ही ट्रेकिंग का रास्ता शुरू हुआ, मे आगे आगे, तेज़ी से (बिना ये ध्यान दिए कि हिप हॅंगिंग टाइट जीन्स मे मेरे नितंब कैसे मटक रहे है) थोड़ी देर मे राजीव ने आ के मेरा साथ पकड़ लिया. सड़क पीछे छूट चुकी थी. एकदम सन्नाटा था और उस ने मेरा हाथ थाम लिया. ज़ोर ज़ोर से हाथ हिलाते, एक दूसरे को ओर देखते (और अब वह कभी चुप, कभी खुल के किसी नदीदे बच्चे की तरह मेरे उभारो को देखता). कुछ ही देर मे उन्होने गाना शुरू कर दिया,

"सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीन, हमे डर है हम खो ना जाए कहीं, सुहाना सफ़र...'

और हम दोनो मस्ती के आलम मे चले जा रहे थे. मे भी सुर मे सुर मिला रही थी. वो थोड़ा आगे बढ़ गये. तेज़ी से आगे बढ़ने के चक्कर मे मेरा पैर फिसला..और धड़.. धड़ा धड़ मे नीचे की ओर गिरी. थोड़ी ही देर मे कंकड़ों पे फिसलती तेज़ी से. मेरी तो सांस रुक गयी थी. उन्होने पीछे मूड के देखा और डर के मारे मेरी आँखे बंद हो गयी थी.. अगले पल मे सीधे उनकी बाहों मे. मेरा इतना वजन और पहाड़ लेकिन उन्होने सब संभाल लिया. जब मेरी जान मे जान आई तो मेने महसूस किया कि मेरे गुदाज उभार उनके कड़े सीने से कस के दबे हुए थे और मे उनकी मजबूत बाहों मे. उनकी कड़ी तगड़ी मसल्स की ताक़त मैं महसूस कर सकती थी. मेरी पूरी देह सिहरन से कांप रही थी लेकिन डर से नही एक अजब सी उत्तेजना से, जिसे मेने इससे पहले कभी महसूस नही किया था. मेरे उभार पत्थर से कड़े हो गये थे. मेरी पीठ पे जहा मेरी ब्रा का स्ट्रॅप था मे उनकी उंगलियो को महसूस कर रही थी और उनकी गर्म साँसे मेरे गोरे गुलाबी कपोलों पे मन कर रहा था. बस हम दोनो ऐसे ही पकड़े रहे. वक़्त रुक सा गया था..लेकिन कुछ देर मे हम दोनो को होश आया और हम लोग अलग हो गये. शर्म से मेरी निगाहे नीची थी मेने कुछ बुद बुदाया, थॅंक्स जैसा और बोली वो पत्थर मुझे दिखा नही. शरारत के अंदाज मे उन्होने पत्थर को थॅंक्स बोला और मेरी ओर मूड के पूछा लगी तो नही.

मैं क्या बोलती जो चोट लगी थी वो बताने लायक नही थी.

क्रमशः…………………………
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08-17-2018, 02:31 PM,
#7
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--4

गतान्क से आगे…………………………………..

मेरी जीन्स पीछे से गंदी हो गयी थी. पीछे मूड के वो वहाँ झाड़ने के बहाने मेरे हिप्स पे हाथ लगाने लगे. मेने हंस के मुस्कराती आँखो से कहा, बदमाशी मत करो तो बड़े भोले बन के वो बोले, मे तो सिर्फ़ धूल झाड़ रहा था. हाँ, मुझे मालूम है जनाब क्या कर रहे है, मे बोली और उनको दिखा के एक बार मस्ती से अपने नितंब मटका के आगे बढ़ गयी.

पीछे से वो बोले, अरे शराफ़त का तो जमाना ही नही है.

सामने झरना दिख रहा था, कई धाराए दो तीन काफ़ी मोटी थी बाकी पतली. नीचे पानी इकट्ठा हो रहा था. पानी काफ़ी उपर से गिर रहा था और बहोत ही रोमॅंटिक दृश्य था. लोग काफ़ी थे. कई तो सीधे पानी के नीचे खड़े थे, उनमे ज़्यादातर कपल्स थे, कुछ हनिमूनर्स लग रहे थे और कुछ ऐसे ही लड़के लड़कियो के जोड़े. वो बोले चलो ना ज़रा पास से देखो. मेने मना किया तो वो बोले डरती क्यो हो, मे हू ना. हिम्मत कर के मे झरने के पास तक गयी. पानी की बूँदों का फव्वारा हमारे चेहरे पे पड़ रहा था, बहोत अच्छा लग रहा था. मेने नीचे झुक के अंगुली मे कुछ पानी लिया और शरारत से उनके चेहरे के उपर फेंक दिया. अच्छा बताता हू, वो बोले. मे पीछे हटी पर मुझे ये नही मालूम कि मे एक पतली धार के पास आ गयी थी. उन्होने मेरा एक हाथ पकड़ के हल्के से धक्का दिया और मे सीधे धार के नीचे. काफ़ी भीग गयी मे, लेकिन फिर किसी तरह निकल के खड़ी हो गयी. मूह फूला के. पास आ के उन्होने पूछा, "गुस्सा हो क्या."

मे कुछ नही बोली. "कैसे मनोगी ओके.. सॉरी बाबा.." मुंझे लगा कुछ ज़्यादा होगया. मेने फिर पूरी ताक़त से उनको धार के नीचे धकेल दिया. अब वो भीग रहे थे और मे खिलखिला रही थी.

मेने उनसे कहा, "ऐसे. मानूँगी."

"अच्छा.." और अब उन्होने मुझे भी खींच लिया. अब हम दोनो धार के नीचे खड़े भीग रहे थे. उन्होने मुझे कस के अपनी बाहों मे बंद रखा था. सर पे पानी से बचने के लिए जो मेने सर हटाया तो सारी धार सीधे मेरे टी शर्ट के बीच और उसके ज़ोर से मेरे उपर के दोनो बटन टूट गये और पानी की धार सीधे मेरे बूब्स पे और पल भर मे ही मेरी लेसी ब्रा अच्छी तरह गीली हो कर मेरी देह से चिपक गयी और मेरी सफेद टी शर्ट भी. तभी मेरे पैर सरके और मेने कस के राजीव को अपनी बाहों मे भींच लिया.

मेरे उभार उनके सीने से एकदम चिपक गये. राजीव की उंगलिया मेरे उरोजो के उभार से साइड से जाने अंजाने छू गयी. मेरे सारे शरीर मे जैसे करेंट दौड़ गया. पहली बार किसी मर्द की उंगलिया मेरे "वहाँ" टच कर गयी थी और मे एकदम सिकुड गयी लाज से लेकिन.. अच्छा भी बहोत लगा. मन कर रहा था कि वह कस के भीच ले मुझे. पहले तो मेने सहारे के लिए उसे पकड़ा था लेकिन अब मेरी उंगलिया कस के उसकी पीठ पे गढ़ी हुई थी.. शायद वो बिना कहे मेरे मन की बात भाँप गये थे और अब उन्होने कस के, मुझे पकड़ने के बहाने भीच लिया.

मेने थोड़ा सा छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हम दोनो जानते थे कि वो बहने है उसका एक हाथ तो मेरी पीठ पे कस के मुझे पकड़े था और अब दूसरा मेरे हिप्स पे मेने अगल बगल देखा तो बगल मे और मोटी धार मे अनेक जोड़े चिपके हुए थे. जब मेने झुक कर नीचे देखा तो मेरी नज़र एकदम झुक गयी. ना सिर्फ़ मेरे उरोज सफेद टी शर्ट से (जो अब गीली होके पूरी तरह ट्रांशापरेंट हो गयी थी) चिपके हुए साफ दिख रहे थे, बल्कि पानी के ज़ोर से मेरी लेसी, हाफ कप, तीन ब्रा भी सरक के नीचे होगयि थी.

मेरे उत्तेजना से कड़े निपल भी (राम तेरी गंगा मैली मे मंदाकिनी जैसे दिख रही थी, वैसे ही बल्कि और साफ साफ). जब तक मे संभालती उन्होने मेरा हाथ पकड़ कर खींचा और हम लोग एक खूब मोटी धार के नीचे, ये धार एक बड़ी सी चट्टान कि आड़ मे थी जहाँ से कुछ नही दिख रहा था और न ही हम लोग किसी को दिख रहे थे.

वहाँ फिसलन से बचने के लिए अबकी और कस के उसने मुझे भींच लिया और मे ने भी कस के उन्हे अपनी दोनो बाहों मे. मेरे दोनो टीन उरोज कस के उन के सीने से दबे थे और वो भी उन्हे और कस के भीच रहे थे. बस लग रहा था हम दोनो की धड़कने मिल गयी है. पानी के शोर मे कुछ भी सुनाई नही दे रहा था. बस रस बरस रहा था, और हम दोनो भीग रहे थे. लग रहा था हम दोनो एक दूसरे मे घुल रहे हो उनका पौरुष मेरे अंदर छन छन कर भीं रहा हो झरने मे जैसे लाज शरम के सारे बंदन भी घुल, धुल गये हो.
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08-17-2018, 02:32 PM,
#8
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
मेरे दोनो कबूतर खुलने के लिए जैसे छटपटा रहे थे, और उनकी खड़ी चोन्चे सीधे उनके चौड़े मजबूत सीने पे जब उन्होने मेरे नितंबों को पकड़ के कस के भींचा तो मेरी फैली जाँघो के ठीक बीच... उनका बुल्ज़ (मुझे एकदम याद आया कि सुबह भाभी किस तरह उनके "खुन्टे" के बारे मे बोल रही थी) और मे बजाय छितकने के और सॅट गयी. शायद उस समय वो और आगे बढ़ जाते तो भी मे मना ना कर पाती उत्तेजना और पहली बार परे उस सुख से जिसे बता पाना शायद अब तक मेरे लिए मुश्किल है मेरी हालत खराब थी.

झरने मे शायद हम 10-5 मिनिट ही रहे हो लेकिन जब मे उन का हाथ पकड़ के बाहर निकली तो लगा कितना समय निकल गया. जब बाहर निकल कर मेरी ठोडी पकड़ के उन्होने पूछा बोलो कैसा लगा, तो मे शरमा के दूर हट गयी और बोली, "धत्त", मेरी बड़ी बड़ी आँखे झुकी हुई थी. और मे दोनो हाथो से अपने गीले उरोजो को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी.

उन्होने अपने बॅग से कुछ तौलिए निकले. मेने जैसे ही हाथ बढ़ाया तो वो मुस्करा के बोले,

"नही पहले एक पोज़". मेने बहोत ना नुकुर की पर जिस तरह वो रिक्वेस्ट कर रहे थे मेरी मना बहोत देर चलने वाली नही थी. अचानक वो बोले हॅंड्ज़-अप और मेरे दोनो हाथ जो मेरे सीने पे थे उपर हो गये.

"एक दम, अब अपने दोनो पंजे एक दूसरे मे फँसा के.. हाँ सिर के पीछे जैसे मॉडेल्स करती है"

मे जानती थी कि इसके बिना छुट्टी नही मिलने वाली है. मुझे गुस्सा भी लग रहा था और मुस्कान भी आ रही थी.

एक फोटो से छुट्टी नही मिली. एक उन्होने एक चट्टान के उपर से चढ़ के ली और दूसरी ज़मीन पे बैठ के. (वो तो मुझे फोटो देखने से पता चला कि एक मे जनाब ने मेरे गहरे क्लीवेज और दूसरे मे पूरे उभार की) और एक दो फोटो और खींचने के बाद ही मुझे तौलिया मिला. हम लोग ऐसी जगह थे जहाँ चारो ओर उँची चट्टाने थी, पूरी तरह परदा था और खूब कड़क धूप आ रही थी. मुझे चिढ़ाते हुए वो बोले, "सुखा दू. अच्छी तरह रगड़ रगड़ के सुखाउन्गा. तुरंत सूख जाएगा" मेने भी उसी अंदाज मे आँख नाचा के कहा कि, वो मेरी ओर पीठ कर लें जब तक मैं ना बोलू. अच्छे बच्चे की तरह बात मान के तुरंत वो मूड गये. अपनी शर्ट तो उन्होने उतार के पास के चट्टान पे सूखने डाल दी थी. उसके नीचे उन्होने कुछ नही पहन रखा था, इस लिए उनकी पूरी देह साफ साफ दिख रही थी. मेने मूड के उनकी ओर पीठ कर ली और अपनी टी शर्ट उठा के अंदर तक तौलिए से अच्छी तरह पोन्छा.

और फिर फ्रंट ओपन ब्रा खोल के वहाँ भी ब्रा को अड्जस्ट कर के जीन्स की भी बटन खोल के. मैं बीच बीच मे गर्दन मोड़ के देख ले रही थी कही वह चुपके से देख तो नही रहे है. पर लाइक आ पर्फेक्ट जैन्तल्मेन एक बार भी ..कनखियो से भी नही. और अब सारी बटन बंद कर के जब मेने उनकी ओर देखा तो उनके शरीर की एक एक मसल्स ज़रा भी फट नही रही थी, कमर एकदम जो कहते है ने कहर कटी, शेर की तरह पतली कुछ कुछ मेल मॉडेल्स जो दिखाते है वैसे ही.. एक बार फिर मेरी देह मे वैसी ही सिहरन होने लगी जैसे उनकी बाहों मे झरने के नीचे सर झटक के मे चुपके से दबे पाँव उनके पीछे गयी और पीछे से कस के उन्हे अचानक पकड़ लिया लेकिन जैसे ही मेरी गोलाइयाँ मेरी टी शर्ट के अंदर से ही सही, उनके पीठ से लग रही थी, मुझे लग रहा था मेरी आँखे अपने आप मूंद रही है. वो अचानक मुड़े और उन्होने मुझे थाम लिया.

और हम दोनो बेसाखता हस्ने लगे. उन्होने अपनी शर्ट उठाई और पास मे ही एक घास के मैदान की ओर दौड़ पड़े और मे भी उनके पीछे पीछे. वो लेट गये घुटने मोड़ के. मे भी उनके घुटने पे पीठ टेक उनकी ओर मुँह कर के बतियाने लगी. जाड़े की गुनगुनाती, हल्की चिकोटी काटती धूप, पास मे झरने का खिलखिलाने का शोर, खुल कर दुनिया को भूल आपस मे मस्त सरवर मे केली क्रीड़ा करते हंस के जोड़ो की तरह औरत मर्द, एकदम रूमानी माहौल हो रहा था. और मे उनसे ऐसे घुल मिल के बात कर रही थी जैसे हम एक दिन पहले नही ना जाने कितने दिनो से एक दूसरे को जानते हो. और मे ऐसी बेवकूफ़ अपने मन की सारी परेशानिया, बाते, उनसे कह गयी. बिना कुछ सोचे कि. लेकिन एक तरह से अच्छा ही हुआ. मे अपनी पढ़ाई के बारे मे सोच रही थी. उन्होने रास्ता सुझाया कि उनकी भी अभी ट्रैनिंग तो दो बरस की है. तब तक मे ग्रॅजुयेशन का पहला साल तो कर ही लूँगी. मे ये सोचने लगी कि क्या मुझे फिर अलग रहने पड़ेगा तो मेरे मन की भाँप, वो बोले कि अरे बुद्धू, ट्रैनिंग का अगला साल तो फील्ड ट्रैनिंग का होगा, किसी जिले मे. तो फिर हम साथ साथ ही रहेंगे. हाँ और दो तीन महीने की मसूरी मे फिर ट्रैनिंग होगी तो हम लोग यहाँ साथ साथ रहेगे और मेरे मूह से अपने आप निकल आया, और फिर यहाँ भी आएँगे. वो मुस्करा पड़े और बोले कि लेकिन थी तुम्हे उतने सस्ते मे नही छोड़ूँगा जैसे आज बच गयी. मेने शर्मा के सर झुका लिया.

फिर ड्रेस के बारे मे भी मुझसे नही रहा गया और मैं पूछ बैठी कि मुझे वेस्टर्न ड्रेस पहनने अच्छे लगते है तो हंस के वो बोले मुझे भी और शरारत से मेरे खुले खुले उभारो को घूरते बोले, तुम्हारे उपर तो वो और भी अच्छे लगेंगे. मेने शरमा के अपने टी शर्ट के बटन बंद करने की कोशिश की पर वो तो झरने की तेज धार मे टूट के बह गये थे.

उन्होने फिर कहा, "अरे यार शादी होने का ये मतलब थोड़े ही है कि तुम दादी अम्मा बन जाओ, मेरा बस चले तो जो मॉडेल्स पहनती है ना वैसे ही डेरिंग ड्रेस पहनाऊ." अब फिर लजाने की मेरी बारी थी.

उन्होने ये भी बताया कि वो अपनी खींची फोटो डेवेलप भी खुद करते है और अकादमी मे एक डार्क रूम है, उसी मे, इस लिए जो उन्होने फोटो खींची है और खींचेंगे वो 'फॉर और आइज़ ओन्ली" होंगे. मेने उनसे कुछ कहा तो नही था, पर मेरे मन जो थोड़ी बहोत चिंता थी वो भी दूर हो गयी. तभी हम दोनो ने दूर सड़क पे मुड़ती हुई कार देखी, जिससे भाभी और मम्मी को आना था. हम दोनो खड़े हो गये.. वही लोग थे.

धूप से कपड़े तो सुख गये थे पर भाभी की तेज निगाहो से बचना बहोत मुश्किल था. उनकी ओर देख के वो मुस्करा के बोली, "आख़िर आप ने मेरी ननद को गीली कर ही दिया लेकिन आप की क्या ग़लती. ऐसा साथ पाकर कोई भी लड़की गीली हो जाएगी.
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08-17-2018, 02:32 PM,
#9
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
पहले तो मे थोड़ा झिझकी, लेकिन मेने भी सोचा क़ि अफेन्स ईज़ बेस्ट डिफेन्स. मे झट से बोल पड़ी, "ये क्यों नही कहती कि आप का गीला होने का मन कर रहा है. ले जाइए नी भाभी को झरने के नीचे."

और वो तुरंत भाभी का हाथ पकड़ के खींच ले गये और भाभी भी खुशी खुशी झरने मे अंदर घुसने के पहले मुझे सुना के वो उनसे बोली, "तुम्हे नही लगता कहीं से जलने की बू आ रही है".

"हां भाभी लगता तो है" मेरे ओर देख के सूंघने की आक्टिंग करते हुए, नाक सिकोड के वो बोले.

"लगे रहो लगे रहो. यहाँ कोई जल वल नही रहा है." मे मुस्करा के बोली.

"देखा. तभी मे कह रहा था कि चोर की दाढ़ी मे तिनका." वो हंस के बोले.

"दाढ़ी मे या" कुछ हंस के भाभी ने उनके कान मे कहा और फिर वो दोनो हस्ने लगे. उसके बाद तो झरने के नीचे कुछ मुझे दिखा चिढ़ा के वो ऐसे लिपट चिपेट रहे थे, झरने की धार का मज़ा ले रहे थे कि पास के हनिमूनर्स जोड़े मात खा रहे थे.

मम्मी मुझसे पूछने लगी कि हम दोनो मे क्या क्या बाते हुई. मेरी मम्मी, मम्मी से बहोत ज़्यादा थी, मेरी पक्की सहेली, बेस्ट कॉन्फिडेंट, जिनसे मे कुछ नही छिपाती थी. मम्मी के मन मे बस ये फिकर लगी थी कि मे कुछ ऐसा ना गड़बॅड कर दू, कहीं कुछ ऐसा नी हो जाए कि रिश्ता टूट जाए. लेकिन जब मेने मम्मी को सारी बाते बताई वो बहोत खुश हुई खास कर पढ़ाई के बारे मे. जब भाभी और 'वो' लौट कर के आए, तो दोनो हाथ पकड़े, हस्ते हुए. भाभी की साड़ी तो पूरी तरह उनकी देह से चिपकी, खास तौर से उनका लो कट ब्लाउस, उनकी गोरी गोलाइयाँ अच्छी तरह झाँक रही थी. थोड़ी देर मे, वो चेंज कर के आई तो मुझे चिढ़ा के पूछने लगी, "क्यो बुरा तो नही माना"

"नही एकदम नही, अच्छी तरह गीली हुई कि नही"

"कुछ जगह बची रह गयी लेकिन तुम चाहे जितनी जलो, मे छोड़ने वाली नही. आख़िर नेंदोई पे सलहज का भी पूरा हक़ होता है, क्यों." उन्होने राजीव से मुस्करा के पूछा."

"एकदम भाभी, मेरे लिए तो बोनस है." मम्मी हम लोगो की छेड़छाड़ सुन कर चुप चाप मुस्करा रही थी और खाना निकालने मे लगी थी.

खाना उन लोगो ने रास्ते मे पॅक करा लिया था. खाने के बाद उन्होने दो अंगूठिया निकाली और वहीं रिंग सेरेमनी भी हो गयी.

मेने सबको बताया कि राजीव कॅमरा लाए है, फिर क्या था, फोटोग्रफी भी हुई. उन्होने पहले हम तीनो की खींची और फिर हम सब के साथ ऑटो पे लगा के सब की ली. मेने ज़िद की - कि एक फोटो मैं खींचुँगी उनकी, भाभी के साथ. भाभी तो झट से तैयार हो गयी. वो वहीं थोड़े शर्मा के दूर खड़े थे.

भाभी लेकिन एकदम पास न सिर्फ़ चिपक के खड़ी हो गयी और उनका हाथ खींच के अपने कंधे पे रख लिया. अब वो भी खूब मज़े ले रहे थे. मेने छेड़ा,

"अर्रे इतने डर क्यों रहे हैं हाथ थोड़ा और नीचे, भाभी बुरा नही मानेंगी और भाभी थोड़ा अपना आँचल" भाभी ने ठीक करने के बहाने अपने आँचल ढालका लिया और उनका हाथ खींच के अपने बड़े बड़े उभारों पे सीधे. वो बेचारे बड़े नर्वस महसूस कर रहे थे. लेकिन हम मज़े ले रहे थे. वो हाथ हटा पाते उसके पहले मेने तुरंत एक स्नेप खींच लिया. मुझे क्या मालूम था कि मैं अपनी मुसीबत मोल ले रही हू.

भाभी ने कहा अब मैं भी तो तुम दोनो की एक फोटो ले लूँ और फिर कभी धूप कभी छाँव के बहाने हम दोनो को एक दम सुनसान जगह मे ले गयी. फिर हम दोनो को खड़ा कर दिया. वहाँ से कोई भी नही दिख रहा था. राजीव ने तो बिना कहे हाथ मेरे कंधे पे रख दिया और मैं भी इतनी बोल्ड हो गयी थी कि मेने भी हाथ नही हटाया. लेकिन भाभी को इससे कैसे संतोष होता. पास आके उन्होने उनका हाथ सीधे मेरे उभारों पर, और टी-शर्ट वैसे भी अभी भी इतनी गीली थी कि सब कुछ दिखता था. उन्होने उनकी उंगलिया, मेरे 'वहाँ' के बेस पे, शरम से मेरी हालत खराब थी. मेने हाथ हटाने की कोशिश की लेकिन उन्होने फोटो खींच ली. भाभी का बस चलता तो वो होंटो से भी.. मेने बहोत मना किया लेकिन तो भी 4-5 बहोत ही 'इंटिमेट' फोटो उन्होने हम दोनो की खींच कर ही छोड़ा.

क्रमशः…………………………

शादी सुहागरात और हनीमून--4
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08-17-2018, 02:32 PM,
#10
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--5

गतान्क से आगे…………………………………..

रात को राजीव हम लोगो को छोड़ने, टॅक्सी से देहरादून तक आए. रात मे 10 बजे हमारी ट्रेन थी, मसूरी एक्सप्रेस. रास्ते मे एक दुकान को दिखा के वो बोले कि ये यहाँ की सबसे अच्छी बेकॅरी है. वहाँ रुक के हम लोगो ने ब्लॅक फोरेस्ट और पायनाअप्पल पेस्ट्री खरीदी. वो आगे बैठे थे और हम तीनो पीछे. भाभी ने एक पाइनअप्पल पेस्ट्री मेरे मूह मे दे दी. जब मेने आधा काट लिया तो उसे मेरे होंटो पे रगड़ के, उनसे इशारा कर के बोली, अर्रे आप भी तो खाइए. वो बेचारे, आगे की सीट पे बैठे, उन्हे क्या मालूम कि पीछे क्या हो रहा है. भाभी ने अपने हाथों से उन्हे मेरी अधखाई पेस्ट्री खिला दी. फिर हम दोनो क्या मम्मी भी अपनी मुस्कान नही रोक पाई.

हम लोगों की बर्थ एक फर्स्ट क्लास के चार बर्थ वाले कॅबिन मे थी. समान रख के वो नीचे उतरे तो मैं और भाभी भी उनके साथ उतरे, उन्हे छोड़ने के लिए.

भाभी ने मेरा हाथ दबा के धीरे से बोला "अर्रे अब तो एक छोटी सी चुम्मि दे दे."

मैं शर्मा के रह गयी. जब गाड़ी ने चलने की सीटी दी तो भाभी अंदर चल दी.

लपक के उन्होने मेरे हाथ मे एक गिफ्ट रॅप्ड पॅकेट पकड़ा दिया. ट्रेन धीरे धीरे रफ़्तार पकड़ रही थी. मेरे गुलाबी होंठ लरज रहे थे. मेने दो उंगलिया होंटो पे लगा के उन्हे फ्लाइयिंग किस दिया, और उन्होने भी ना उसे सिर्फ़ पकड़ लिया बल्कि अपने होंटो से उंगली लगा के जवाबी फ्लाइयिंग किस दिया. जब तक उनका हिलता हुआ हाथ दिखता रहा, मैं वहीं दरवाजे पे खड़ी रही हाथ हिलाते. पॅकेट मे एक खूबसूरत सा हॅंड मिरर था. जब मेने उसमे देखा तो मेरा ध्यान शीशे के नीचे लिखी लाइन पर गया और मैं मुस्करा, शर्मा के रह गयी. उस पे लिखा था, 'यू आर लुकिंग अट दा मोस्ट ब्यूटिफुल गर्ल'. और साथ मे एक लव पोवेम्स की किताब थी, सुनील गंगोपाध्याय की, 'फॉर यू नीरा'.

जब मैं कॅबिन मे आई तो भाभी ने मुस्करा के पूछा, "क्यों लिया कि नही"

मेरी कुछ समझ मे नही आया. मेने पूछा, "क्या"

वो मुस्करा के बोली, "अर्रे ये भी समझाना पड़ेगा, उस के होंटो का स्वाद. अपने होंटो का स्वाद तो उसे पेस्ट्री के बहाने चखा दिया तो उस के होंटो का स्वाद तो चख लेती"

मेने तकिया उठा के उनके उपर फेंका. भाभी भी बिना ये सोचे कि मम्मी वहाँ है. पर मम्मी भी कम नही थी वो भी बैठे बैठे मज़े लेती थी. थी तक टी.टी. टिकेट चेक करने आया और उसने बताया कि चौथी बर्थ खाली है और उसपर कोई नही आएगा. हम लोग कॅबिन अंदर से बंद कर ले. कॅबिन बंद कर के हम लोगों ने नाइटी पहन ली. मम्मी अपनी बर्थ पे लेट के सो गयी और मैं भाभी की बर्थ पे बैठ के बाते करने लगी. भाभी ने बत्ती बंद कर के मुझे भी अपनी रज़ाई के अंदर खींच लिया और धीमे से पूछी,

"अच्छा अब बता. सुन उसने तुझे छुआ था कि नही. कुछ पकड़ा पकड़ाई हुई कि नही"

"नही भाभी.. हां भाभी पकड़ा..तो नही था...हां" मैं भाभी से झूट नही बोल सकती थी. "हम ज़रा सा उनकी उंगली यहाँ लग गयी थी छू गयी थी. ऐसा कुछ खास नही"मेरे मन के सामने फिर वहीं झरने के नीचे का दृश्य आ गया और मेरे उभार सख़्त हो गये भाभी ने कपड़ो के उपर से ही मेरे उभार कस के दबोच लिए और बोली,

"ये क्यों नही कहती बन्नो कि आज खुल के तुमने उसको जोबन का दान दिया. अर्रे वो तो मुझे मालूम ही पड़ गया था कि वो तेरे इन जवानी के फूलों का दीवाना है. लेकिन अब उसका पूरा हक़ है इन्पे. मैं उस के बारे मे नही पूच्छ रही थी. तुम ने उस का हथियार पकड़ा, छुआ कि नही. क्यों कि मेने कस के छुआ, नाप जोख की थी!!!"

भाभी का हाथ अब मेरी नाइटी के बटन खोल के मेरे ब्रा के उपर से, मेरे उत्तेजित पत्थर की तरह सख़्त उरोजो को ब्रा के उपर से सहला रहे थे. भाभी ने ब्रा को ज़रा सा हटा के मेरे एरेक्ट निपल को फ्लिक किया और अपनी बात जारी रखी,

"उसका आवरेज से बड़ा ही लगता है. आवरेज तो 5-6 इंच का होता हे लेकिन उसका उससे और मज़ा भी तो बड़े ही मे आता है. तुम्हारे भैया का भी आवरेज से काफ़ी बड़ा है और अभी तक मुझे याद आता है जब सुहागरात मे पहली बार.. लिया था उन्होने इतने दर्द हुआ था कि आँसू निकल गये थे मेरे"

"क्या भाभी सच मे बहोत दर्द होता है." सिहर कर मेने पूछा.

"अगर मैं कहु नही तो मैं झोट बोलुंदगी. पर अर्रे पगली पर इसी दर्द का तो इंतजार रहता है सब को शादी के पहले डर लगता है और शादी के बाद उस की याद आके इतना अच्छा लगता है और जो मज़ा. मेने तो सब ट्राइ किया है, डिल्डो, विब्रातोर, उंगली जो मज़ा लंड के साथ है ना वो किसी चीज़ मे नही."मेरे निपल भाभी ने उत्तेजित होके कस के दबा दिए और मैं भी सिहर गयी. उसे रगड़ते सहलाते भाभी ने बात जारी रखी,
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